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माँ (3 comments) 
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   माँ Posted By Abhishek Vats (May 11 2016 4:51am IST)

 

माँ का प्यार है बड़ा ही निर्मल,इसको कैसे लिख दूँ,
पल भर में वो रो देती है, उन मोती को चुन लूँ ...

छोटी-छोटी बातों पर वो गुस्सा हो जाती है, और गुस्सा होकर के मुझको बड़ा सुनाती है...
उसको गुस्से के हर आखर पर, एक बात यही बस होती है...
कर लें परेशां मुझको कितना, आग तुझ ही से पाऊँगी..
उसको इस आखर को सुनकर, मैं गम-सुम हो जाता हूँ,
एक कोने में रो रो कर माँ का प्यार समझता हूँ, और उसका प्यार समझकर के एक बात यही बस कहता हूँ...

माँ का प्यार है बड़ा ही निर्मल,इसको कैसे लिख दूँ,
पल भर में वो रो देती है, उन मोती को चुन लूँ ...

वैसे तो एक माँ की उपमा कोई नहीं इस जग में,
पर एक माँ की उपमा दूजी माँ से मैं करता हूँ दिल से..
एक कुंती वो माँ है जो पालती है बच्चे को, और दूजी कुंती वो माँ है जो ठुकरा दे लल्ला को...
दोनों रूपों की समता से एक बात ये ही बस कहता हूँ...

माँ का प्यार है बड़ा ही निर्मल,इसको कैसे लिख दूँ,
पल भर में वो रो देती है, उन मोती को चुन लूँ ...

अगर समझना है माँ के प्यार को, तो जाकर पूछो बिन माँ की संतानों से,
जो सदा ही रो कर ये कहते हैं-
माँ का प्यार था बड़ा ही निर्मल उसको कैसे बतलाएं, पल भर में वो रो देती थी.. अब किसका रोना देखें....

जो नहीं समझते माँ के प्यार को उनसे वत्स का कहना..
कोमलता को दुर्बलता मत समझो बच्चों, वरना फिर पछताओगे...
माँ जब दुर्गा बन जाएगी तब कुछ ना कर पाओगे...
वत्स का कहना अन्त में इतना...

एक रूप है कोमल माँ का, दूजा है विकराल
दोनों रूपों को नमन वत्स का जो हैं बहुत विशाल...

Written By / Source :Abhishek vats

Om Bhurbhuvaha Swaha tatsaviturvarenyam bhargo devasya dhimahi dhiyo yo nh prachodayat

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