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तपोभूमि का त्रिदिवसीय प्रवास (0 comments)
January 08 2014 9:05pm IST


   तपोभूमि का त्रिदिवसीय प्रवास ( By Sri Prakash ) ; January 08 2014 9:05pm IST

 


तपोभूमि का त्रिदिवसीय प्रवास, गुरुवर संग स्वाध्याय ख़ास ।
परिजनों का अतुलित उत्साह, घटनाओं का सुखद प्रवाह ।
जैसे चिरपरिचित हों अपने, प्रतिज्ञ सजाने गुरु के सपने ।
गुरु है हम सबका सूत्रधार, हम कठपुतली वे थामे तार !
शक्तिशाली चेतन महाकाल, नियंत्रण करती युग की चाल ।
अनंत गुणित देवत्व का वेग, धीमा पड़ रहा असुरता संवेग ।
ये परिजन महाकाल के अंश, गुरु हाथों के शक्तिशाली यन्त्र |
सादगी सज्जनता रही झलक, प्रेम आत्मीयता निरखे अपलक |
जैसे हैं अपने पूर्व मित्र, लीला सहचर ये गुरु आमंत्रित ।
गुरु श्रीकृष्ण सम प्रतीत, सहस्राब्दी ऐतिहासिक पुनरावृति ।
ये परिजन ही थे ग्वाल बाल, युग परिवर्तन चक्र महाकाल ।
कभी खेले थे यमुना किनारे, कृष्णा सखा गोवर्धन धारे ।
जीवन की अनगिनत भरमार, जुड़ा युगों का टूटा तार !
एकत्रित आज तपोभूमि के द्वार, ये घटक प्रज्ञा अवतार ।
विचारों से अभिपूरित मन, हुए रात्रि हम निद्रा-मग्न ।


अगले प्रातः ब्रह्म मुहूर्त में, स्नान आदि निवृत फूर्त में ।
पिछले कल का समेटा विचार, कल्पना का दस्तक बार बार |
गुरु उपस्थित जब स्थूल शरीर, कल्पना पहुंची भूत काल चीर |
कल्पना में गुरु के क्रिया कलाप, उठना बैठना चलना मिलाप ।
उत्सुकता यह जानने की अदम्य, अपने स्तर जो सुबोधगम्य ।
कुछ बुजुर्गों से किये निवेदित, अस्पष्ट उत्तर पर भाव मिश्रित ।
धूमिल स्मृतियों के पार, सुने संस्मरण और विचार ।
उद्वेलित ह्रदय हो बार बार, जैसे वीणा के झंकृत तार ।
चेतना को दे रही झंकझोर, अंदर गूंजती कल्पना की शोर ।
अब अंदर उपजा यह सत्य, अबोधगम्य यह लीला रहस्य !
इन्द्रियातीत लीला हैं गुरुसत्ता के, बंधा नहीं वो समय क्षेत्र से ।
व्याप्त वो सृष्टि के कण कण में, गुरुतत्व प्रतिष्ठापित हर मन में ।
आवश्यकता पात्रता विकास की, चिंतन चरित्र साधना प्रकाश की ।
अटूट विचारों का वह क्रम ! नव युग महाभारत जैसा उपक्रम ।
युग सैनिक जैसे परिजन विचरें, माँ गायत्री का कवच पहिने ।
एकत्रित हुए प्रांगण गुरुधाम, जो गुरु विचार वाहक अविराम ।
बढ़ चले हम वृंदावन मार्ग पर, उतरे युग साहित्य केंद्र पर ।


देखी गौशाला गौ मातृ वंश, सहज बढाती सात्विकता का अंश ।
गोकुल गायों की कल्पना जैसी, देसी प्रजाति उन्हीं की संतति !
श्रीकृष्ण प्रिय उनसे आकर्षित, वंशी धुन पर भाव विस्मित ।
गौ दुग्ध धरा अमृत समान, विकसे सत्व बल मेधा महान ।
गुरु के चौबीस महापुरश्चरण, निर्भर हो गौ दुग्ध छाछ पर |
इन विचारों के भावुक क्रम में, सोचा वर्त्तमान स्थिति गोवंश के ।


कटती माँ कर रही पुकार, मूक वेदना में भीषण चीत्कार !
असुर आज हावी समाज में, गौ माता निरंकुश परिधि में ।
यांत्रिक पीड़ा दे दे कर इनको, नष्ट की जा रही गो वंश को ।
हम इतने बेदर्द हो गए, अशुभ निराशा से भर गए ।
संस्कृति रक्षार्थ नहीं जुड़े, पुण्य कर्मों से मुख मुड़े ।
तोड़ दुष्टों के पाश जाल को, छुड़ा न सके गो वंश को ?
कहाँ गयी शिवाजी की तलवार, छत्रशाल का घातक प्रहार ।
हिन्दू रक्त में वो प्रबल उबाल, भू मंडल का दे बदल चाल !
पर क्यों अब यह शांत हो गयी, कायरता जड़ता चतुर्दिक छा गयी ।
आज असुरता नहीं केंद्रित है, यह जन मन में बिखरी पड़ी है ।
कुविचार कुरीति कुसंस्कार में, आत्म विस्मृति प्रदर्शन अहंकार में ।
स्वार्थ असंयम लोलुपता में, कायरता कुत्सा ईर्ष्या मोह में ।
यद्यपि हावी अधोगामी प्रवृति, समय चक्र की प्रबलतम गति ।
संस्कृति पुनर्स्थापित करने को, सामाजिक असुरता हरने को ।
गायत्री ब्रह्मास्त्र साधना कवच, वैज्ञानिक विचार ऋषिवर प्रदत ।
संस्कृति के हम प्रहरी बन, कर्तव्य क्षेत्र में डटे रहे हम ।
संघ की शक्ति कलयुग में, असुरता डरती है इससे ।
युग धर्म नवीन परिवेश, कायरता का न किंचित समावेश ।
जन मेदिनी का हो रहा अवतरण, सोये सिंहों का अब जागरण ।
तब काफी एक ही हुंकार, बिल खोजते असुर सियार ।
निश्चित ही नव युग आएगा, गौ वंश प्रतिष्ठा पायेगा |
हम तो वाहन, गुरु वाहक है, गुरु चेतना प्राण प्रवाहक है ।
गौ हित भावना में हुए विभोर, मुड़े साहित्य विस्तार केंद्र की ओर |


आगे देखा साहित्य विस्तार, साक्षात् नव युग मत्स्यावतार ।
अत्याधुनिक यंत्रों से सज्जित, विचार क्रान्ति बीजों से मंडित ।
गुरु विचारों का स्थूल स्वरुप, जैसे समेट रहे प्राणों का पुंज ।
अनंत ज्ञान अगणित सुविचार, युग साहित्यों की अम्बार !
अग्नि शिखा सम प्रकाशमान, विद्युत् स्फुर्लिंग शक्ति तंतु समान ।
सादे अक्षरों में ये आवृत, चेतना क्षेत्र के लिए विशिष्ट अति ।
कुसंस्कार कुरीतियों को उखाड़ निर्मूल, बदले व्यवस्था आमूल चूल ।
युग भागीरथ का पुण्य प्रयास, और भोले शंकर का जटा वास ।
गुरु तप के गंगा की वेग, पुस्तक कलेवर में ज्यों थमी संवेग ।
तारने हरने ज्यों धरती का ताप, बढ़ चली वेग से धोने पाप ।
परम पुण्य का अवसर दिए, गुरु विचार घर घर पहुंचे ।
गुरु चेतना असर दिखाएगी, उलटे को उलट कराएगी ।
लोग सीधी राह पा जायेंगें, सत्पथ पर रफ़्तार बढ़ाएंगें ।
परिजन अवतारी सत्ता के अंश, श्रेय पुण्य का उचित प्रसंग ।
श्रवण कुमार सा कर श्रम भार, ऋषि विचारों से जोड़ें जन -तार ।
गुर विचारों का सुगम प्रवाह, कुरीतियां नष्ट सद -वृति उछाह ।
जन मानस में देवासुर संग्राम, या समुद्र मंथन सत्काम ।
असुरत्व हो हलाहल से दग्ध, साहित्य सुधा चतुर्दिक लब्ध ।


अब बढे आंवलखेड़ा की ओर, मथुरा वृंदावन को पीछे छोड़ ।
वाहन में सब आसीन हुए, गुरु ग्राम दर्शन की कल्पना किये ।
यह भूमि बड़ी सौभाग्यशाली है, जहाँ श्रीकृष्ण लीला निराली है ।
प्रकृति में मधुर शीतलता थी, इसमें मधुर रमणीयता थी ।
भगवान् भास्कर कृपा बरसाए, सुखद उष्णता की चादर फैलाये ।
जहाँ मंदिर स्थान देवताओं की, दर्शन ग्राम तीरथ गौवों की ।
फूले सरसों से पटे खेत, निराली शोभा निरखते नेत्र ।
प्रज्ञा परिजनों का मधुर तान, प्रज्ञा गीतों का क्रमबद्ध गान ।
ढपली पर लगे संगीतों के सुर, कानों में बरसे रस सुमधुर ।
ये महाकाल के अंश धार, चलते शक्तिपीठ जीवंत आधार ।
कृष्ण कालीन ये ग्वाल बाल, रीछ वानर ये राम-काल ।
ये हीरे हैं उस माला के, जो समर्पित महाकाल के ।
ऋषियुग्म ने इन्हें संवारा है, युग देवता पर न्यौछारा है ।
मानव महासागर के मोती दुर्लभ, गोताखोर प्रयास हुए सुलभ ।
सम विचार पर खड़ा किया, देव सेना का ताना बुना ।
समर्पण गुरु पर तो श्रेय सम्मान, इनमें अर्जुन और हनुमान ।


इस यात्रा में है जीवन रहस्य, दर्शन गति पड़ाव व लक्ष्य ।
संगी साथी यदि सम विचार, यात्रा सुखद आनंद रस सार ।
सामने गायत्री शक्तिपीठ जब, कल्पना विचार भाव मुड़े तब ।
गुरु का जय घोष किये, उत्साहित स्वर में जय नाद हुए ।
मंदिर में नतमस्तक हो दर्शन, भाव पूरित युग शक्ति नमन !
पवित्र भूमि यह पावन तीर्थ, बखान रही युग ऋषि की कीर्ति ।
जो गुरुग्राम में है अवस्थित, गुरु चरण से हुआ पवित्र ।
इसकी मिट्टी में मनुज रूप, भगवान् अवतरित बन गुरु स्वरुप ।
शक्तिपीठ का वह भोजन प्रसाद, स्वादिष्ट व्यंजनों का भूला स्वाद ।
नव युग गाथा नव युग धरोहर, साक्षी है ये नवयुग अवरोहण ।
अमरभूमि यह युगातीत, गुरु पद चापों से गुंजित वीथि ।
गुरु के बाल्यावस्था के संस्मरण, कल्पना भावों में हुए त्वरण ।
सब कल्पना भाव अभिभूत हुए, धीमी गति से आगे बढे ।
यहाँ विश्वामित्र सा तप कर, जौ रोटी छाछ पर हो निर्भर ।
सिद्ध किया गायत्री ब्रह्मास्त्र, वेदमूर्ति विशारद अगणित शास्त्र ।
आत्म क्षेत्र विलक्षण प्रयोग, वैज्ञानिक अध्यात्मवाद संयोग ।
प्रखर प्रज्ञा पावन उद्देश्य, समर्पित जीवन बस गुरु आदेश ।


श्रद्धा भाव से पूरित होकर, पहुंचे अब गुरु गृह द्वार पर ।
दादा गुरु से वह प्रथम साक्षात्कार, कल्पना ली मन में आकार ।
वह दिव्य संयोग वह दिव्य मिलन, प्रफुल्लित धरा का कण कण ।
यही वह सौभाग्यशाली धरा, जहाँ विचार क्रांति बीज अंकुरा ।
ऋषि विचरे इस पवित्र द्वार, जब बालक श्रीराम लिए अवतार ।
देखा माता का विश्राम कक्ष, भावातिरेक नतमस्तक समक्ष ।
सब परिजन क्रमबद्ध बैठ गए, साक्षात्कार कक्ष को रुख किये ।
यहाँ गहरा ध्यान लगा, अनुभूति अलौलिक सुख जगा ।
इन अनुभूतियों को मन धारण किये, वापस मथुरा को लौट पड़े ।


अगले प्रातः पैदल ही प्रस्थान, पहुंचे अखंड ज्योति संस्थान ।
मन में कल्पना फिर रंग भरे, इस पथ गुरु पग पड़े ।
यह पथ धन्य हुई होगी, कण कण प्राणों से सनी होगी ।
चौबीस महापुरश्चरण यहीं हुए, अखंड ज्योति के सृजन हुए ।
माता का था अद्वितीय सहयोग, लीला धर से मिलन योग ।
साधना कर्म सेवा में प्रतिक्षण, तप तितीक्षा में तिल तिल जल ।
प्रज्ञा परिवार बढ़ाया था, प्रतिपल निज को गलाया था ।
यह विराट वृक्ष का जड़ बिंदु, उद्गम स्रोत यह महासिंधु ।
इससे प्रस्फुटित वह शक्तिधार, फैला जग में ले वृहद् आकार ।
गुरुसत्ता लीला को समेट, अनेकों स्मृतियों से विशेष ।
माता का सेवा का भाव, सजल श्रद्धा वात्सल्य स्वभाव ।
लीला सहचरी का अतुलित तप, समर्पण प्रतिमा, श्रद्धा उत्कट ।
प्रकृति का वह महारास, मुक्ति प्रदायिनी बेड़ी पाश ।
कटे बंधन हो मुक्ति यथार्थ, प्राणी मात्र हित रत परमार्थ ।
धरा पर स्थापना नव जीवन मूल्य, हर मानव हो देव तुल्य ।
अवतरित धरा पर बारम्बार, युगानुकूल युग धर्म प्रसार ।
स्वर्ग धरा पर आ जाए, गुरु गीता निज गौरव पाये ।
इस भाव कल्पना में बहकर, वापस लौटे अनुप्राणित होकर ।
तपोभूमि से विदा हो लौट पड़े, तब ये प्रार्थना स्वर उमड़े ----------------------

हे गुरु हमें निर्भय कर दो, जीवन में अनुशासन भर दो ।


हम संसार में भटक रहे, तेरे दर पर हैं खड़े हुए
हम प्रार्थना करते हैं, शुभ भाव हम धारण करते हैं
सुभाव में स्थिर कर दो, प्रतिक्षण स्थिर मति दो
हे गुरु हमें निर्भय कर दो....................


तेरी महिमा न भूलें, जग द्वन्द में हम न झूलें
लक्ष्य साफ़ दिखाई दे, भटकाव भ्रम सफाई दे
पथ में फिसलन ना हो, मर्यादित बुद्धि कर दो
हे गुरु हमें निर्भय कर दो....................


कथनी करनी एक बने, बढ़ें सौहार्द वृद्धि करने
विरोधाभास तिरोहित हो, स्नेह सौभाग्य जीवित हो
तुच्छ अहम् विलय कर दो, सामूहिकता भर कर दो
हे गुरु हमें निर्भय कर दो ....................


हम अकिंचन प्राणी हैं, हम आपके आभारी हैं
गुरुवर हमें बचा लेना, लड़खड़ाए कदम डिगा देना
स्वार्थ की दल दल ना हो,परमारथ विकसित कर दो
हे गुरु हमें निर्भय कर दो....................


सतवृतियां फैलाएं हम, जनहित कदम बढ़ाएं हम
मानव में देवत्व भरे, स्वर्ग धरा पर उतरे
सत्पथ पर दृढ़ निश्चय हो, मन साहस से भर दो
हे गुरु हमें निर्भय कर दो....................


Composed By- Sri Prakash (sriprakash.rai@gmail.com) 5th January 2014


   

Om Bhurbhuvaha Swaha tatsaviturvarenyam bhargo devasya dhimahi dhiyo yo nh prachodayat

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