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    तुम्हारी राहें ( By Rohit Shrivastava ) ;

 


मैंने रोशनी बाँटी है अंधेरों को, तुम्हारी राहें जगमगाने के लिये!
मैं खिला बैठा हूँ राह के हर पत्थर पर, तुम्हारे पांव सहलाने के लिये!!

इस राह के आगे तुम्हारी जो भी हो मंज़िल जहाँ,
दु:ख ढूँढ़ ना पाये कभी, तेरा ठिकाना है कहाँ!
राई भर भी दर्द जो आया तुम्हारी राह में,
पीर बाँटूंगा तुम्हारी बाँह लेकर बाँह में!
तिल-तिल जलूँगा, राई का दाना गलाने के लिये!
मैं खिला बैठा हूँ राह के हर पत्थर पर

और राहों पर खिले हों पुष्प-पादप सर्वदा,
कोयलें तुमको सुनायें गीत खुशियों के सदा!
गर कभी जो राह आयी कष्ट और कंटक सहित,
पलकें बिछा दूँगा, तुम्हारे पांव हों पीड़ा रहित!
और बहूँगा हर पलक से, दो पग धुलाने के लिये!
मैं खिला बैठा हूँ राह के हर पत्थर पर

- रोहित श्रीवास्तव \'अथर्व\' [ connectingrohitit@gmail.com ]

Om Bhurbhuvaha Swaha tatsaviturvarenyam bhargo devasya dhimahi dhiyo yo nh prachodayat

Comments

Sri Prakash ( sriprakash.rai@gmail.com ) wrote...
nice !!

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