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Poetries By Sri Prakash
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तपोभूमि का त्रिदिवसीय प्रवास (0 comments)
January 08 2014 9:05pm IST


   विज्ञान - सुख सरोवर , सुखसागर है अध्यात्म- Part 2 ( By Sri Prakash ) ; January 08 2014 9:05pm IST

 



पीपल वृक्ष क्यों पूजनीय
नहीं समझ में आता
मृगछाला कुश चटाई क्यों
सतगुरु का चरणामृत पीता

सभी परम्पराएं ऐसे लग रहीं
जैसे हो प्रश्नचिन्ह लकीर
समझ में नहीं क्यों आदर देते
आता यदि कोई फकीर

प्रदूषण नहीं मालूम पड़तीं
इसपर हो गई उपेक्षित दृष्टि
मौसम कैसे खिसक रहे
वातावरम गर्म, अनियमित वृष्टि

प्राणवायु परिवर्तित होता धूम्र में
खपत बड़ी है इसकी वाइड
मोटर कारखाने करते परिवर्तित
आक्सीजन से कार्बन डाई आक्साइड

वृक्ष बन हैं काटे जा रहे
कौन करेगा यह क्षति पूर्ति
क्या सांस लेगें हम दम घूँटेगा
इसीलिए देवता हैं वृक्ष

ओजोन पर बनती ढाल कई
अमंगलकारी ऐनर्जिज के
अल्ट्रावायलेट आदि हानिकारक तरंगे
दौड़ती पृथ्वी की और सूर्य से

ओजोन परत के ओजोन कणों से
अल्ट्रावायलेट कर रही संयोग
नीचे आक्सीजन की डेन्सिटी कम है
अतः आती नीचे करने योग

ओजोन की ढाल खप रहीं हैं
नीचे की विभीषिका हरने में
पर इसके कारण है आ पड़ी
आफत बड़े पैमाने में

ओजोन परत में छिद्र हो गया
कौन रोके असुर अल्ट्रावायलेट का आगमन
घुस पड़ी संसार समाज में
प्रतीत होती स्थिति भयावन

अल्ट्रावायलेट के कारण क़यामत
नहीं व्याख्या करने की चीज
अब आया समझ में की क्यों
वृक्ष पूजती हैं अपनी संस्कृति

पीपल सर्वश्रेष्ठ प्राणवायु प्रवाहक
इसीलिये माना गया पूज्यनीय
देवता न मन जाता तो काटे जाते
स्थिति होती बड़ी दयनीय

धार निसृत होतीं शरीर से
तलवे कनिष्ठा आदि से विशेष
इसीलिये पैर छोना और चरणामृत पीना
गुरु हाथ पड़ता शिष्य के शीष

ध्यान अदि से उत्पन्न तरंगें
का हो परिपूर्ण शरीर में उपयोग
इसीलिए सुचालक छूना मन है
लौह आदि तत्वों का निषेद्ध संयोग

पाजिटिव निगेटिव विद्युत तारें मिलते
तो फाल्ट आदि की कर्कश आवाज़
मृगछाला आदि कुचालक और
कुश चटाई पर बैठने का रिवाज़

आज भी विज्ञान सिद्ध कर दिया
कि कुचालक साधन है सारे
जिनको पार नहीं कर सकतीं
शरीर विद्युत की धारें

दोहा - पीपल वृक्ष पूजनीय, प्राण वायु प्रवाहक |
पत्तों पर देवों के वास, तोड़ना है नाहक || 14


विज्ञान जा पहुंचा उपग्रहों तक
ठीक यह बात हम जाने
पर क्या धरती पर मनुष्य मनुष्य
के मानसिक भेद हम जानें ?

स्वास्थ्य दी अस्वस्थों को
पर भोग साधन भी दिया
पर न उचित दृष्टिकोण दी
बस श्रेय ही तूने लिया

अस्वस्थों पर किये सारे परीक्षण
क्या स्वस्थों के स्तर भेद जाने ?
जड़ों से नहीं ये , चेतन प्रयोग हैं !
उचित दृष्टिकोण आवश्यक, नहीं मनमाने

क्यों मानव तन धरता प्राणी
क्यों कोई संत तो कोई चोर
क्यों कोई हरदम सुख भोगे
और विपत्ति किसी के चारो ओर

क्यों कोई स्वस्थ शरीर पता
जन्मजात ही उपलब्ध सामग्री
क्यों कोई भूखे सोता, रोता
और घिसती पिटती कराहती जिंदगी

मानव जीवन एक अलभ्य अवसर
दो अवस्थाओं के बीच की कड़ी
और लक्ष्य सार्वकालिक है
वो है मोक्ष परम सुखदायिनी

मोक्ष है स्थिति मिलन का
चेतना का परम चेतना में
कुछ आत्माएं मिल चुकीं, और कुछ मिलेंगीं
आने वाले काल में

मौलिक रूप से आत्माओं में
है नहीं कोई अंतर
आत्मा विकार रहित व पूर्ण है
इसे हम समझेंगें तदनंतर

जब प्रक्षेपित किया जाता पाषाण खंड
शांत जल के सरोवरों पर
होतीं विचित्र हलचलें इसमें
आँखें ठहरतीं लहरों पर

ठीक यही स्थिति मानव मन की
शांत मन में बातें हैं विस्मृत
ह्रदय सरोवर से टकरातीं, उत्पन्न भाव लहरें
खोलतीं कुछ पूर्व स्मृति

देह भिन्न भिन्न , आत्म मूल एक
हर्ष विषाद काम क्रोध की विभिन्न परिस्थितियाँ
भिन्न भिन्न सरोवर पर जल एक ही
पाषाण प्रक्षेपण की विभिन्न स्थितियाँ

जिस सरोवर का जल जितना निर्मल
प्रसूत लहरें उतना ही निर्मल
आत्मा यदि स्वच्छ तो अधिक संवेदनशीलता
प्रज्ञा विवेक यदि नहीं तो मंदी

दोहा - आत्मा में अभेद, परमात्मा है एक |
भिन्न भिन्न संस्कार, बनाती मनुज अनेक || 15

जल तो एक ही है वह है आत्मा
\"शीघ्रता\" विशेषता है बुद्धि
प्रक्षेपण के कारण उत्पन्न लहरें
गुण प्रक्षेपणता है मन की स्थिति

मन करता तभी पत्थर फेंकें
है आत्मा इससे सर्वथा भिन्न
इस प्रकार हम देख सकते की
मन बुद्धि आत्म शरीर विभिन्न

कारण मिटती तो गोलीय तरंगें
छोटी होती जातीं क्रमोत्तर अनभिज्ञ
कितनी भी छोटी क्यों न हों पर अस्तित्व इनका
अनंत समय तक , ये विज्ञान सिद्ध

ये आवश्यकता पड़ने पर
उचित समय हैं जाती उभर
इसी प्रकार संस्कार भी सूक्ष्म रूप में
भ्रमण करतीं हैं जन्म जन्मान्तर

संस्कारों , कुसंकारों के समूह को
हम कहते हैं प्रारब्ध
जीव मात्र पर कितना प्रारब्ध
ये ज्ञान है गुरु को लब्ध

जाना जीव को परम मंजिल तक
ये प्रारब्ध उसे हैं जकडे
एक गुण स्वयं समंजक कि
वो सबसे सरल मार्ग पकडे

प्रारब्ध भोग क्रमागत जन्मों में नहीं
हो सकता कि सौवें जन्म बाद आये
कभी साधु बन , कभी चोर बन भोगता
वो पकड़ता है स्मालेस्ट वे

जब ये भोग मात्र हो जातें
एक निश्चित सीमा के अन्दर
बाँट जाते शुभ कर्म शुभ चिंतकों पर
चढ़ते दुष्कर्म अशुभ चिंतकों के सर पर

इसीलिये कहा गया कि यदि भोग करें हम
पर रखें हम त्यागी वृति
अनासक्ति हर वस्तु में रखें
न कोई शत्रु न कोई मित्र

दोहा - सतगुरु को जरूरतें पड़ीं, सेना सेनानियों की |
गायत्री तो माता सामान है, प्रज्ञापुत्रों की || 16

जिस जीव का जैसा नेचर
सम्बद्ध वस्तुएं वैसे ही गुण वाले
तंत्र साधना के लिए वनराज खाल अभीष्ट
दाम मार्गी को मृगछाले

जड़ की शक्ति है सीमित
चेतना की है शक्ति अपार
सम्बद्ध वस्तुएं वैसे हीं बनतीं
जैसा है मनुष्य का विचार

जैसा भावना वैसा परिवर्तन
इसका है सुनिश्चित विज्ञान
अतः सत साधक गुरु गृह को जाता
औघड़ जाता है श्मशान

जैसी भावना वैसी फ्रीक्वेंसी
वैसी तरंग है विद्यमान अनंत
वैसी वस्तुएं खीचतीं जातीं
चेतन है जड़ का रूप जीवंत

गौ घृत से सतोगुणी तरंग
अतः आतीं सतोगुणी धार
तामसिक चीजों पर ध्यान लगे
तो भारती जाती तामसिक विचार

सुपर टेक्नोलॉजी मानने लगा अब
जड़ नहीं , विद्युत ही मूल ईकाई है
अनाहत नाद ही वह मूल ईकाई
क्या इसमें और नहीं गहराई है ?

सृष्टि, ब्रह्माण्ड जड़ चेतन सबमें
ईथर की कल्पना आती है
क्या परिकल्पनाएं नहीं वेदों के
प्राण शक्ति प्रतिपादन से मेल खातीं हैं

सभी एनर्जी मात्र एक ही हैं
ये प्राण के विभिन्न रूप हैं
ध्वनि, ताप , विद्युत अलग नहीं
अभिव्यक्तियों के कई स्वरुप हैं

वैसे ही जैसे बूँद
समुद्र से मिलकर होती एक रूप
आत्मा परमात्मा केवल माया का भ्रम
यदि टूटे तो हो मिलन अनूप

समुद्र के लहरों में न कोई अंतर
दीखतीं यद्यपि अनेक हैं
मिले आत्मा यदि विराट में
लेती रूप एक हैं

वेदों की रचना कैसे हुई
और इसका महान प्रयोजन
ऋषियों के ह्रदय तार झंकृत हो गए
सुनकर कुछ शुभ वादन

लगा की अदृश्य आवाज़
ब्रह्माण्ड से है आ रही
आज कल जैसा शोध नहीं तब
कुछ अलग ही तरीका रही

कारण, जिज्ञासा , परिकल्पना पर्यवेक्षण
से सम्बंधित हैं तथ्य
अनुभूति जन्य व तीव्र तप प्रदत
श्रुतियां ( वेद ) हैं सत्य

आजकल जैसे प्रयोगशाला नहीं
न थे आवश्यक कीमती यन्त्र
कोष, ग्रंथियां , नाडियाँ युक्त
शरीर है सुव्यवस्थित तंत्र

वास्तु के जड़ पक्ष का नहीं उतना महत्व
खोज था चेतन स्तर पर
चेतना पक्ष को परखने के लिए
नहीं आवश्यक था उतना जड़

चेतना का जड़ में रूपान्तर
पलक के ही झपकते
हवा में हाथ घुमाया कि होते उपस्थित
दिव्य रथें , धनु , वाण आयुधें

तथाकथित बुद्धिजीवी नकारते रहे
अपनी ऐतिहासिक व्याख्याएं
पर आज भीं मिल जाते सत्य प्रमाण
जैसे समुद्र में डूबी द्वारिकाएं

दोहा - चार प्रकार की वेद हैं, ज्ञान का महासागर |
आर्षग्रंथों का सूत्र, गुरु कर दिए उजागर || 17

किसी जीव के अंतर्वेदना जानने
को नहीं आवश्यक था जड़
उस सम्बद्ध अंग से प्राण कम्पन मिलाकर
सुन लेते थे उसके चेतन

ऋषि वनस्पतियों के फ्रीक्वेंसीज से
निज प्राण कम्पन्न मिलाते थे
और इनके गुणधर्म का भेद
स्वतः ही खोल लेते थे


वेदों की पर्यायवाची हैं श्रुतियां
सुनीं गयीं पर नहीं चर्म कर्ण से
ऋषि तप त्याग से युक्त
अन्तःकरण स्वच्छ धवलता जैसे

एक श्लोक कई कई अर्थ
ऐतिहासिक और आध्यात्मिक
शब्दों की गुंथन विशेष स्वर लहरियां
प्रभाव डालतीं जैसे औषधि

लोक प्रचलन बड़े महत्व के
इनमें वैज्ञानिकता का है समावेश
सविता अर्ध्य, जनेऊ स्नान
सब परिपूर्ण वैज्ञानिकता से

प्रातः व संध्या सविता से
कोमल प्राणदायी रश्मियाँ निसृत होतीं
जल चढाते हम खड़े होकर तब
रश्मियाँ जल कणों से जा टकरातीं

विसर्जित होती चारों ओर
कुछ व्युत्पन्न रश्मियाँ जातीं
कुछ किरणें शरीर व्याधियां हरतीं
कुछ नेत्रों को सहारा पहुंचातीं

जनेऊ में मनोवैज्ञानिक लाभ आदि
पवित्रता भावना का है समावेश
ठीक इसी प्रकार स्नान विधि भी है
युक्त वैज्ञानिकता से

गंगाजल पहले सर पर चढाते
तब डालते हैं उसमें पैर
इसमें भी वैज्ञानिकता है
श्रद्धा का भी तो है खैर

ताप का गुण है कि बहती
जब है तापान्तर रहती
ऊँचे ताप से निम्न ताप की ओर
यह तुंरत है जा पड़ती

अगर पहले पैर का ताप कम
मस्तिष्क होती अपेक्षाकृत गरम
किन्तु चाहिए मष्तिष्क ठंडा
अतः शीष पर चढाना धर्म करम

दोहा - कुछ लोक प्रचलन, हैं उचित सर्व काल |
मानें इसे हम ना खोएं, दूजा नहीं सवाल || 18


वेदों की भाषा है संस्कृत
संस्कृत क्यों सर्वश्रेष्ठ, एक सुनिश्चित कारण
देवभाषा भी इसे कहते हैं
करती है यह विशेषता धारण

देवनागरी लिपि की शब्दों के आकार
की लें एक खोखली धातु नली
फूंकें शंख के तरह किसी सिरे से
उत्पन्न स्वर जैसे उच्चारण बोली

भाषा के क्षेत्र में भाषावाद की
बहुत कटु गरल है
यह सिद्ध हो गया कि कंप्यूटर के लिए
यही भाषा सबसे सरल है

सबसे पुरातन सबसे मौलिक
सब भारतीय और यूरोपियन भाषाओँ की जननी
उचित उच्चारण उचित तरंगें
सब फलदायी सब कलिमल दहनी


बोला विज्ञान कि
ढोंग दिखाई देता समाज में
छापा माला चन्दन रोडी
कोई सर पे तो कोई कंठ में
पूरा शरीर है लपेटे अघोडी

माला का महत्व है भावनात्मक
तथा जप संख्या का उचित गणक
छापे , चन्दन रोडी ग्रंथियों पर
जो हैं अभीष्ठ भावों के उत्प्रेरक

मानव मस्तिष्क है गोल
गोल है पृथ्वी और ब्रह्माण्ड
जो समष्टि में वो सूक्ष्म रूप में व्यष्टि में
और भी कुछ हैं कर्म काण्ड

जिससे उन दैवीय उर्जाओं या
फ्रीक्वेंसीज को पकडा जाए
शिखा स्थान पर उर्जा संग्राहक ग्रंथियां
बाल से क्यों , यों समझा जाए

बालों में है बड़ी चुम्बकीय शक्ति
जब कंघी है इनसे रगड़ती
कागज़ के छोटे टुकड़े
उनसे जाकर हैं सताते

दैवीय उर्जाओं को दिव्या तरंग या देव कहें
या कहें अदृश्य उत्तम विचार
T V के एंटीना के तरह खींचती
दिव्या क्षमताएं या सुविचार

शंख फूंकने से होतीं उत्पन्न
ऐसीं दिव्य स्वर लहरियां
दिव्य उर्जायें आ टकरातीं
विषाणु मरते, दूर होतीं अनेक बीमारियां

ह्विं क्लीं उच्चारण से होती
उत्पन्न कुछ ऐसी तरंग विशेष
अन्यथा इन शब्दों का क्या अर्थ ?
उचित भावः ट्यूनिंग रह गयी शेष

प्राणायाम भी विशेष प्रक्रिया है
प्राण के उचित भण्डारण की
प्राणों का महासागर भरा पड़ा
ऐसे ही नहीं कुछ विधियां इसकी

इडा पिंगला है दो नाडियाँ
सुषुम्ना नाडी है इनके बीच
एक पाजिटिव दूजा निगेटिव
प्राण जब लेतें हैं खींच

जैसे पोटेंसिअल डिफ़रेंस हो तो
दो तारों के बीच विद्युत धरा बहती
वैसे ही धरा कुण्डलिनी से टकराती
रिद्धि सिद्धि के भण्डार खोलती

जैसे जैसे ऊपर जाती है
करती है क्रमशः चक्रों को भेद
अंतिम अवस्था में ऐसा होता की
साधक का भगवान् से अभेद

सरोवर व्यष्टि, महासागर समष्टि
एक आत्म दूजा परमात्म
दीखने में स्वतंत्रकाय पर सूक्ष्मरूप में
अनुदानों का होता आदान प्रदान

आत्म बूँदें तपतीं, वाष्पीभूत होतीं
मेघों पर जा चढ़तीं
कुछ वायु में कुछ द्रवीभूत हो नीचे आतीं
कुछ सत्सागर में जा मिलतीं

फिर वही स्थिति हे गुरु
ढो रहें हम माया जाल
सावन भादों बनता जीवन सारा
चाहिए कुछ अमृत अनुदान

दोहा - कर्मकांड नहीं दिखावे, ये प्रमाणित मनोविज्ञान |
ज्ञान काण्ड का पूरक, ले इसे हम जान || 19


कहता विज्ञान की
क्या नहीं ढोंग कीर्तन कथा
तप तीर्थ और पूजन
कितने सारे व्रत त्यौहार
भरे पड़े इनसे सारे सीजन

दिवाली में क्यों व्यर्थ दिए जलते
छूटते पटाखे जैसे गोली
होलिका दहन में हो हल्ला
रंग गुलाल लिए आती है होली

कीर्तन कथा बहुत जरूरी है
ये सब हैं धार्मिक पढाई
जैसे अभ्यास में करना पड़ता
समझना, याद करना आदि रगडाई

आत्मविस्मृति है मनुज का स्वभाव
भूलना सिद्ध करता है मनोविज्ञान
भूलना, याद करना आदि का क्रम
आध्यात्मिक साधना है और महान

व्रत का आध्यात्मिक कारण तप अर्जन है
पाचन शक्ति बढ़ाना भौतिक
मनोबल बढ़ता, व्याधियां हटतीं
भाव इसमें है धार्मिक

जब वर्षा काल बीतता, सड़ती वस्तुएं
आते अनेकों प्रकार के विषाणु
गन्दगी का साम्राज्य होता
तब दिवाली सफाई में मरते हैं कितने विषाणु

जलते दिए यज्ञ स्वरुप हैं
यज्ञों की महिमा है अपार
यह भाव उल्लास की सत्य की जय हो
जाती हो आहुतियों पर सवार

भाव उल्लास भरे रहना दूजा पक्ष है
आवश्यक इसके लिए होली
अपने त्यौहार मौसम अनुकूल
कईयों लाभ देने वाली

रंग उल्लास वर्धक हैं
मोहक क्षमता है इनमें
रंग तरंगों की फ्रीक्वेंसी विभिन्न
दायरा दृश्य सीमा में

सुकोमल हरित पल्लवों में
होती है अजीब आकर्षण
कुछ रंगों से होती है कुछ के
मन में विशेष विकर्षण

हलकी गुलाबी और नील निलय रंग
को देखने से जी नहीं है थकता
केसरिया त्याग, श्वेत शान्ति और
पीत वर्ण है शुभ और वीरता का

महापुरुषों की औरा शुभ्र
त्यागियों के केसरिया ढंग
क्रोधी लाल, देशप्रेमी गुलाबी
दुष्टों की धारें नीलें रंग

होलिका दहन एक यज्ञ स्वरुप है
भावः इसमें असुरता दमन
महायज्ञ अपने आप होता
प्रभावित करती सब जन के जीवन

दोहा - मनुज मनाये त्यौहार, भरे जीव में भाव |
पर्वों की वैज्ञानिकता, दूर करे दुर्भाव || 20


प्रकृति में जन्मदात्री जैसी मातृ शक्ति
उससे भी अति संवेदनशील
कालातीत ये सब शक्तियां
सभी धर्मों के लिए सार्वजनीन

ये भी तो एक तरंग है
कैसे पकड़ में आये ये
आवश्यक भाव ट्यूनिंग ही देती
गायत्री जप की उचित वे

कितना आश्चर्य दर्शन भी होता
उस मातृवत सत्ता का
वह व्यष्टि में और समष्टि में
हर जगह उपस्थिति उसका

सुपात्र साधक को जैसे समाधि में
होतीं कई दृश्य अनुभूतियाँ
जैसे सपने में हम कुछ देखें
याद रहतीं दृश्य अनुकृतियां

सिद्ध ऋषियों की चेतना समर्थ है
करने में सब अलौकिक कर्म
गुरुवार की चेतना सता है
विद्यमान गायत्री फ्रीक्वेंसी पर

अनुदानों का भी प्रावधान है
हमें चाहिए उचित वेब्लेंथ
विभीषिकाएँ समाप्त होनी हैं
परिपुष्ट होनी है सोशल हेल्थ

संतानें कितनी दूर भी क्यों न हों
माता को हरदम अवलोकित
ये ह्रदय तरंगों की समानता है
जान लेती पुत्र की स्थिति


अति आनंदमय अगम अगोचर
आसक्ति हीन अविराम
सरल सनातन स्नेही सत्ययुक्त
सुखदायी व सत्काम

कामना , कुटिलता , कुटेवों का
है केवल कपट जाल
दे दो दर्शन हे देव दूर करो
दस इन्द्रियों का यह मायाजाल

मद मोह मत्सर को न दें महत्व
मलिन मन देगा मार
भावना से भगवान् भासते
हैं कराते भवसागर पार

भ्राता, भगिनी सभी हैं नश्वर
नहीं शाश्वत भार्या भरतार
शाश्वत बस एक ही है
उसे सत्य कहें या कहें करतार

हे हरि हर लो हृदि तुच्छता
आया समझ अध्यात्म की विभुता
भोगवाद ढा दिया विपत्ति विभीषिका
आया समझ है इसकी लघुता

दोहा - गंगा और गायत्री, सुखदायी आधार |
गोमुख और सतगुरु से , सम्बंधित ये धार || 21



( Written by Sri Prakash [ sriprakash.rai@gmail.com ] for Gayatri Shaktipeeth, Harbanshpur Azamgarh ,)

Om Bhurbhuvaha Swaha tatsaviturvarenyam bhargo devasya dhimahi dhiyo yo nh prachodayat

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