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January 08 2014 9:05pm IST


    विज्ञान - सुख सरोवर , सुखसागर है अध्यात्म- Part 1 ( By Sri Prakash ) ; January 08 2014 9:05pm IST

 

विज्ञान - सुख सरोवर , सुखसागर है अध्यात्म

कहता विज्ञान कि ...


क्या नहीं पता कि विदेशों में
कैसे कैसे हो रहे अन्वेषण
क्या बाकी रहा गया विज्ञान से ?
जीव, ग्रह, नक्षत्र या भूतल

तथ्यों पर आधारित विज्ञान
तो तुंरत फलदायी है
पर तर्कशील कैसे मान ले ?
सत्य परम हितकारी है

कारण, जिज्ञासा, परिकल्पना, पर्यवेक्षण
तब ही आती है निष्कर्ष
कैसे कैसे चमत्कार हो रहे !
और मानव जीवन में उत्कर्ष !

दोहा - भौतिक सुख यातायात, असाध्य रोग निदान |
सभी सुविधा विज्ञान से, बहुजन हिताय विज्ञान || 1

मैं फिर उससे पूछा कि ----

ऐ बंधु क्या ये सभी साधन
करती सिद्ध उत्कृष्टता भौतिक शास्त्र ?
क्या नहीं थे अपने देश में पहले
चरक, धन्वन्तरी, दिव्यौषधि , ब्रह्मास्त्र ?

क्या जड़ विज्ञान का हौसला रह सकता
इसी तरह बुलंदियों कि ओर ?
क्यों अनेकों पाश्चात्य वैज्ञानिकों कि खोजें
अब हो रही चेतन जगत को ओर

मैं फिर उससे पूछा कि क्या
मौलिक कणों को किसी ने देखा ?
जिस वस्तु पर कड़ी जड़ - जगत परिकल्पनाएं
क्या वही है सही रूपरेखा ?

इलेक्ट्रानों कि द्वैती (= dual) चरित्र है
कभी कण तो कभी तरंगों में
कोई सिद्धांत कणों से सत्य कोई इसे तरंग मान
एकरूपता नहीं जड़ सिद्धांतों में

ये सब सिद्धांत नहीं है प्रथम
न ही मौलिक अन्वेषण
मात्र करतीं ये सब वेदों के
कई सिद्धांतों का समर्थन

दोहा - परमात्मा ही है मूल, नहीं कण मौलिक |
जड़ नहीं चेतना ही, वस्तु है अलौकिक || 2

क्या विज्ञान निर्मित कोई यन्त्र
जिसमें हो माता जैसा प्रेम विचार ?
गायत्री मंत्र कैसी विलक्षण !
साधक अनुभव करता नित प्यार

क्या रोबोट में होती संवेदना
अचेतन का चेतन से कम महत्व
यह नहीं पोंक्ष सकता रोतों के आंसू
न ही दिखा सकता अपनत्व

जड़ अन्वेषण में एकरूपता नहीं
अन्वेषण का अपूर्ण आधार
जिन सिद्धांतों पर खड़ी विज्ञान ईमारत
बनती बिगड़ती रही है बार बार

फिर विचित्र प्रतिपादन तथ्यों की
यह तो है दोगली नीति !
सब प्रतिपादन में मूल वस्तु भूल गए
वो तो अद्वितीय चेतन शक्ति

गुरु भी कहा करते थे
भविष्य में होगा कोई विज्ञान
तो वह अध्यात्म विज्ञान ही
सभी अंश , पूर्ण यह ज्ञान

सभी नदियाँ दौड़तीं सागर को
सागर होता अंतिम पड़ाव
जड़ खोजें पहुंचती चेतन की ओर
तभी स्पष्टता अन्यथा अभाव

चेतन शक्ति को मान सत्य बस
नहीं पूछना ऐसा क्यों
वैसे जैसे वैज्ञानिक परिकल्पनाएं
अन्वेषण के पहले ज्यों

इस समय माया क्षेत्र में हैं
जड़ नहीं पकडे मायातीत बातें
माया के बहार जाने के लिए
चाहिए कई घात प्रतिघातें

माँ गायत्री का अंचल पकडे रहें
माँ बहुत करुणामयी स्वजन
घाव दोषों से मुक्त कराती
जन्मदात्री माँ भी करा ऑपरेशन !

दोहा - भौतिक, जीव, रसायन, व वनस्पति विज्ञान |
सब दीपक पर सूर्य है, आध्यात्मिक ज्ञान || 3


डी ब्रोगली के सिद्धांत से होता
वैदिक ज्ञान का स्पष्टीकरण
यह खोज भी है वस्तु के
चेतनशीलता का प्रमाणीकरण

सभी पेड़ पौधे पर्वतादि जद
करते नियत आवृति ( frequency) से दोलन ( rotation )
सभी की है नियत फ्रीक्वेंसी
सबमें विद्यमान है चेतन !

ध्वनियों में विभेद करने के लिए
हैं ये फ्रीक्वेंसी सहायक
इसकी सीमा शून्य से अनंत तक
मानव पकड़ बस बीस हज़ार तक !

कुत्तों, चमगादड़ को कुछ ज्यादे सुलभ
उनको हमसे है अधिक दायरे का भान
कुत्ते का सूंघ पता लगाना आश्चर्य
करती आश्चर्य फ्रीक्वेंसी का ज्ञान

गायत्री मंत्र के नियत ले से
होती उत्पन्न इन्द्रियातीत तरंग
कितनी अनुभूतियाँ उत्पन्न होतीं !
साधक पाता नित नित उमंग

अल्ट्रासोनिक आदि फ्रीक्वेंसी से
कर लेता विज्ञान कुछ काज
बैखरी, परा, पश्यन्ति वाणियों पर
क्यों नहीं भारत को नाज़ !

कान हैं माया से बंधे
पर ह्रदय का है क्षेत्र विशाल
मायातीत हों पहले तब देखें
अनहद फ्रीक्वेंसी का कमाल

मानव वाणी की फ्रीक्वेंसी सीमित
अतः अनुभूतियाँ है वर्णनातीत
पर ह्रदय का तो क्षेत्र विशाल है
अनुभूति जन्य , असंभव कथित

दोहा - कुशल योद्धा व रथें, दिव्य धनुष व वाण |
उत्तम मंत्र साधनाएं, नहीं मात्र संधान || 4


फिर पूछता विज्ञान कि ----------
नहीं समझ में आता कि क्यों
गायत्री मंत्र पर देते तुम जोड़
क्यों है इसका इतना महत्व
क्यों इसकी वैज्ञानिकता बेजोड़ ?

मैं फिर उससे बोला कि ------


सैनिकों को नहीं चलने दिया जाता
एक ही लय से पूलों पर
और बर्तन खनखनाने लगते
चलती रेलगाडी यदि दूरी पर

धरती व पूल बहुत वजनी हैं
नहीं हिलें थोड़े शक्तियों से
ध्वनि के लय ताल की शक्ति है
विज्ञान सिद्ध कई युक्तियों से

सब आयुध प्राकृतिक शक्तियों का अन्वेषण
और उनका दिव्य समंजन
अध्यात्म समुद्र , विज्ञान सरोवर
गायत्री मंत्र एक महान अवलंबन !!

ध्वनि की शक्ति है बहुत बड़ी
बहुत महान है मंत्र गायत्री
शब्दों की गुंथन है अद्भूत
वेदादि समस्त जगत ज्ञान जन्मदात्री


मात्र स्वर नहीं पहुँच सकते
चाहिए साधन, ह्रदय की उपयुक्त भाव तरंग ( waves)
बल्ब तभी जल सकती जब
तार और विद्युत का हो संग

गायत्री से प्रसूत तरंग ( waves) की
आकृति है कुछ चक्राकार
उर्ध्वगमन करती सूर्यमंडल को
लौटती ले अनुपम उपहार

जीव विज्ञान बोलती मानव में
अमाशय , अड्रिनल इत्यादि ग्रंथियां
मूलाधार, अन्नमय , मनोमय को
मानती है वह भ्रांतियां

कोश, ग्रंथि, उपत्ययिका , नाडियाँ
आदि चीजें हैं सुक्ष्म आध्यात्मिक
सत्य का सम्बन्ध अनुभूति से
तथ्यों का सम्बन्ध है भौतिक

श्रवण अतीत स्वरों की पहुँच
है इन अदृश्य वस्तुयों में
गायत्री उत्पन्न करतीं तरंग (waves)
जो पहुंचती इन ग्रंथियों में

विश्व ब्रह्माण्ड में है जो विद्यमान
उसकी है मानव शरीर अनुकृति
अध्यात्म से चमत्कारी परिणाम
अपना साधना, सुचिन्तन वृति


छद्म वेशी के मीठी बोली से
उत्पन्न कुछ ऐसी तरंग
कर्ण प्रिय पर ह्रदय वेधी वह
नहीं जाता शिशु उसके अंक

स्वर का क्षेत्र बहुत विस्तृत है
अद्भूत है इसकी नज़ारा
शिव, प्रभावकारी, कुटिल, कर्कश
वीभत्स और अश्लील आकारा

सबकी विचित्र हृदयगोचर फ्रीक्वेंसी है
वाणी असंयम से व्यर्थ जीवन सारा
विज्ञान नहीं समझा संयम को
हम लें गायत्री मंत्र का दृढ सहारा

दोहा - जीभ संयमित राखिये, करिए ह्रदय से बातें |
गलत वाणी फ्रीक्वेंसी, तुडा सकतीं दातें || 5


एक ओर भूखमरी की विभीषिका
दूजा अणुशक्ति खर्चे का होड़
देशों के बीच कैसा कपट !
धमकी देता देने को फोड़

ब्रह्म , आग्नेय, पाशुपत अस्त्र क्या
नहीं थे पूरा पूर्वजों के पास ?
ह्रदय क्षेत्र उनका व्यापक था
बहुत था उनका आत्मविश्वास

सिद्धियाँ केवल कौतुहूल नहीं
कठिन मनुष्य का आत्मनियंत्रण
पूर्वजों की चेरी थीं सिद्धियाँ
आतीं बिना दिए निमंत्रण


विज्ञान से हो सकता बस
सीमित क्षेत्र में ही वर्षण
पूरा पूर्वजों के पास थी क्षमता
जिससे वृष्टि, वरुण आदि का आहवान


धन मात्र साधन था उनका
द्रवित होते देख जग हाहाकार
नहीं बताते की उनके पास
विलक्षण शक्तियों का था भण्डार

शक्तियों का प्रयोजन उचित दिशा में
ये मानव कल्याण के निमित्त
पूरा पूर्वजों को महसूस था
पर आज शक्तिवान कितने असंयमित !

जड़ की शक्ति बस सीमित ही है
उसे आवश्यक यूरेनियम की
तप शक्ति चेतन मयी है
आवश्यकता मानसिक सुनियोजन की

एकाग्रता ही एकमात्र कूंजी है
प्रकृति के रहस्यद्वार पर दस्तक देने की
समाधि आदि ही समझाती विधियां
अलौकिक चेतना जगत् में गोता की

अग्नि के पास तापनुभूति होती
ताप ही गुण है इसकी
ईश प्रदत राह पर चलें तो अति आनंद भान
पूर्ण आनंदमय परमात्म चेतन ही


दोहा - असंगत लगती ये सब, हम सब माया के अधीन |
आगे बढ़ें जैसे एक, जल चीरती मीन || 6

बहुत गहराई से नहीं व्याख्या
एक उदाहरण ले हम जान
वह वैज्ञानिक और आध्यात्मिक
वह है आइनस्तीन महान

सापेक्षवाद के सिद्धांत ( theory of relativity) में
होता मायावाद का दर्शन
रेलगाडी में बैठे व्यक्ति को
चलते दीखते स्थिर भवन

जलती तवा पर हाथ रखें तो
एक क्षण लगती काल विकराल
यदि किसी को लग जाए समाधि
तो कईयों दिन कुछ क्षण समान

सभी वस्तुएं मायायुक्त हैं
सबकी स्थिति है सापेक्ष ( relative )
वस्तुतः है कुछ और भासता दूजा
बस परमसत्ता ही है निरपेक्ष ( absolute )

पत्नी करती पति से प्रेम पर
जब आता दाम्पत्य जीवन में मोड़
नरक उत्पन्न करते गृह- क्लेश
जाता मन संपत्ति की ओर

कहाँ वह सुहावना शैशव काल
सरल ह्रदय और सुकुमार गात !
जगत बड़ा निष्ठुर आता समझ
जब व्यस्क लगाता माँ को लात

माता वही बालक उसका ही
तब क्यों अब मानस में परिवर्तन
फोर डायमेंशनल स्पेस को मानें
और समझें सापेक्षवाद ( theory of relativity) का दर्शन

वास्तविक कुछ और भासती कुछ और
शाबास धन्य है उनकी मजाल
जो निकलने की कोशिश करते कूप से
यह है माया का जंजाल

आइनस्तीन से पूछा गया की कौन वह ओरिजिन
जिसका नहीं ले रहे नाम
चुप्पी खोली और बताया उसने
अब आगे आध्यात्मिकता का काम !!

उसके कब्र पर लिखवाया
वही सत्ता चेतनायुक्त, सर्वव्यापी इर्ष्याहीन
वही वह निरपेक्ष ( absolute ) ओरिजिन
अनुभूति जन्य पर व्याख्याहीन


दोहा - विज्ञान और अध्यात्म, के मध्य एक कड़ी |
जड़ से चेतन की ओर, विज्ञान अब चल पड़ी || 7

अब फिर विज्ञान पूछा कि
ये क्या है तुम्हारी मूर्ति पूजन
क्यों निर्जीव मूर्ति से प्रार्थना करते
जैसे कोई हो यह स्वजन



जड़ मूर्ति तो है निजीव
और न ही है इसमें अकल
न समझे न बोले फिर भी
तुम पर सवार क्यों बेअकल

सारे विधर्मी लोग भी देख
इससे तो कतराते हैं
इसे पूजना तो बहुत दूर
नग्नता मान , हंसते हैं इतराते हैं



यदि कार्य एक और कारण एक
समय भी समान और न साधन भिन्न
तब क्यों कोई सफल कोई असफल ?
कारण एक सत्य अविच्छिन्न

इसमें भावना का ही प्रभाव है
सफल वही जिसे भावना है लगती
इसी कारण अपने प्रचलन में है
बड़ी विधि विधान बुतपरस्ती की

दृश्य लोकों से कई भिन्न लोक हैं
भावनाओं की बड़ी है शक्ति
यह वैज्ञानिक भी बताते की
कई खोजें हो चुकीं अप्रत्याशित

ये सब मूर्तियाँ व्यर्थ नहीं
भाव , ध्यान साधने के यन्त्र हैं
ये पूजन हैं नहीं बल्कि
आत्मोन्नति के उचित तंत्र हैं

दोहा - मन है जैसे चिडिया, विचित्र इसकी उड़ान |
मूर्ति इसका पिंजडा , लग जाती है ध्यान || 8


गीता में भगवान कहे कि
कालों में वह महाकाल
आज काल नहीं महाकाल है
ख़त्म होनी दूष्प्रवितियों का जंजाल

ब्रह्मलोक का एक क्षण है
धरती के कई वर्ष समान
देखा जाय कि कैसे धर्मज्ञ
आश्चर्यचकित हैं इसको जान

समय तो बस एक वस्तु है
कर्म गति मापन का स्केल
दशानन बाँधा था पाटी में
उसके लिए यह था खेल

किसी को कर्म खेल जैसे सहज
उसको पड़ती समय कि किल्लत
दो घंटे जैसे ही बीतें दिन में !
काम अपूर्ण और डर होने की जिल्लत

अनुद्योगी कहता, बाप रे !
कितना बोरियत, कितना बड़ा दिन !
कैसे बीते दिन का सफ़र
दिन काटना हो जाता मुश्किल

वस्तुतः समय की अनुभूतियाँ भिन्न भिन्न हैं
ये हैं कर्म गति पर निर्भर
उद्योगी के लिए सूर्या ढला जल्द से
अनुद्योगी के लिए देर तक ऊपर

यदि कर्म गति कर दी जाय
जितना है प्रकाश की चाल
समय सिकुड़ कर इतना छोटा
जैसा शून्य है इसका मान

परमब्रह्म काल से बंधा नहीं
इसीलिये है वह कालातीत
कर्मगति उसकी अनंत रफ़्तार से
अतः ब्रह्माण्ड के हर कण में प्रतीत !!

रामकृष्ण कहा करते थे रे नरेन् !
कह लोग उठाएं निज किश्ती के पाल
बहुत ही विशिष्ट है यह समय
बहुत उर्जा बस साधना के कुछ काल

हम लोगों का अवसर अचूकनीय है
बड़े हैं हम लोगों का भाग
सब चूकें पर अवसर न चूकें
रिद्धियाँ सिद्धियाँ कुछ समय में जाग

सूक्ष्म जगत में हो रहे अब
परिवर्तन बहुत ही जल्दी हैं
समय रहते चेतना आज की
सबसे बड़ी अक्लमंदी है

दोहा - हैं अनुदानें बरस रहीं, नहीं इसे तुम खोना |
बैंक बलेंस करें हम , नहीं तो कल रोना || 9

अनुदानें होती हैं क्या ?
कैसे हैं ये पायी जातीं
क्या कारण कि अध्यात्म में
अंतर्ध्यान कि कल्पना है आती

पूरा पूर्वजों क्या सुरा सेवन करते थे
सोमरस क्या होती है चीज
हिप्नोटिजम , मेरेस्मिज़म क्या
क्या पुरुषार्थ है उसे अजीज ?

शाप, वशीकरण , उच्चाटन क्या ?
क्या होती साधनाएं तंत्र
क्यों महत्व नवरात्रियों की
और अध्यात्निक यन्त्र जैसे श्री यन्त्र

क्यों महत्व बड़ी अध्यात्म में
भगवा और बासंती रंग
रंग बिरंगे कई वस्त्रों को देख
होती मन की गति भंग ?

आत्मा मूलतः है स्वच्छ पर
जब होती है यह शरीरबद्ध
सफ़र करती चौरासी लाख योनियों के
जमती इसपर राहों की गर्द

कुसंस्कारों के गर्द लिए ये
साथ ही चलती फिरतीं हैं
कुछ गर्द कर्म ठोकर द्वारा झरतीं
कुछ नें फिर इसपर जमतीं हैं

मनुज शरीर मन आत्म संचालित
गर्द पड़ीं हैं इसके ऊपर
गर्द के दो स्वरुप हैं
कुछ है स्वर्ण कण और कुछ कीचड

दोनों ही बांधतीं हैं आत्मा को
करतीं दोनों ही आत्मा को भारी
योग साधनाएं हैं प्रक्रियाएं आत्मधुलाई की
अब है आती अनुदान की बारी

सतगुरु की आत्मा धवल श्वेत
तभी उसमें परमात्म का गुण
देख सकता हममें कितना कीचड और स्वर्ण
नेत्रों पर न उसके माया आवरण

आत्मा की धुलाई होती ताप से
ताप चाहिए, नहीं चाहिए आब !
एकत्रित करनी पड़ती तपशक्ति
ऋषि ट्रांसफर करने में कामयाब

गुरु भी तप का भण्डार
अलौकिक शक्तियों का यह एजेंट
पात्रता देखे और परख ले
तब वह होता है एग्रीमेंट

हर समय यह सुविधा नहीं
नहीं बाद में यह अमूल्य अनुदान
चुक जाता है स्वतः कर्ज
पा लेता है भक्त लक्ष्य महान


दोहा - आ रही है जोरों से, महाकाल की गुहार |
भागो मत वीरों रुको, ह्रदय से लो निहार || 10

इलेक्ट्रोमैग्नेटिक रेडिअशन की है
शून्य से अनंत स्केल
दृश्य प्रकाश की लब्ध सीमा अल्प
शेष फ्रीक्वेंस में नेत्र फेल

पराबैगनी और अवरक्त के बीच
दीख रही संसार का खेल
इनके बीच मात्र साढ़े तीन सौ का अंतर
तो शेष में हमारी नेत्रें फेल


जब पंखों का रेग्युलेटर वन पर
पत्तियां इसकी है अलग अलग दृश्य
जब ये लगतीं पांच पर
लगता है पंखा अदृश्य

सीमितता से बंधी हैं आँखें
दिखता मानव पर प्रकृति को भारी
सिद्ध ऋषियां तो प्रकृति माया मुक्त हैं
माया जकड़ी है दुनिया को सारी

सुरा सोमरस एक नहीं है
अंतर है जैसे आकाश और पाताल
एक विष तो दूजा अमृत
इसका नहीं आज भी अभाव

एक तो है विवेक मारती
ढा देती जीवन में कहर
दूसरी प्रज्ञानेत्र खोलती
दूर कर देती जीवन जहर

जब साधकों को मिलतीं आत्मझलकें
या अनुदानों की अमृतवर्षायें
मदमस्त हो पान करता साधक
आत्मआनंद में ह्रदय हर्षाये

मनुज देवताओं को ही यह सुलभ
नहीं है सुलभ दानवों को
कुपात्र हाथ से होता लुप्त
प्राप्त बस उत्कृष्ट मानवों को

हिप्नोटिजम , मेरेस्मिज़म और वशीकरण
भी हैं पूर्णतः विज्ञान सिद्ध
नहीं इनमें आश्चर्य कि ये सब
हो चुकें हैं जगत प्रसिद्द

पहुंचे साधक में कुछ चमत्कार
और उपस्थित कुछ विशेष पावर
परमात्म पुत्र में सब संभावनाएं
उत्पन्न होतीं कई गुणों की धार

ये धार कल्पना नहीं हैं
सुपर पावर के हैं सब अधीन
ये बस कुछ विशेष तरंगें हैं
जिन्हें नहीं पकड़ सकता मशीन

परमात्मा तो गुणातीत है वो
सर्वशक्तिमान और सार्वजनीन
धार प्रभावित करतीं हैं मनुज को
जिसकी है व्याख्या आसान नहीं

तरंगों के गुणधर्म अनंत हैं
और अनंत हैं उनके क्रियाकलाप
इससे हम समझ सकते हैं
हिप्नोटिजम , मेरेस्मिज़म, वशीकरण और शाप

इन फ्रीक्वेंसिज की नहीं पकड़
सामान्य मष्तिष्क की परिसीमन
आवश्यकता अध्यात्म भाव की
सुचिन्तन चरित्र अनुशीलन

कुछ रेडियो की ज्ञात फ्रीक्वेंसिज
पकडी जातीं उचित ट्यूनिंग पर
तब क्यों नहीं अनुदानें भी ?
उचित भागवत भाव में होकर

माया ही बाधक है परमात्म दर्शन में
चाहिए सुचिन्तन चरित्र वृति
त्याग भाव कुंजी माया की
अतः त्याग भाव है बड़ी अजीज

दोहा - है सतगुरु की महिमा बहुत, नहीं जात बखाने |
अभागे हैं अनजानें, जात कल सब माने || 11

शुभ अशुभ मिश्रित है ब्रह्माण्ड में
अनंत प्रकार की धारें
कुछ फ्रीक्वेंसी शरीर पोषण करतीं
कुछ देतीं हैं जीव को मारे

अध्यात्म एक ब्रह्माण्ड समान है
इसमें निहित अगम, निगम तंत्र आदि सारे
भौतिक, जीव, रसायन, वनस्पति
आदि विज्ञानं है केवल तारे

अध्यात्म के अर्न्तगत ही हम
सभी विद्याओं को हम मान
सब मिलकर जानी चाहती पूर्णता को
इसे लें हम जान

ब्रह्माण्ड अनंत है, फैलती हर क्षण
जाना चाहती किस सीमा में
अपने आकाशगंगा( मिल्की वे ) जैसे असंख्य विस्तृत
ब्रह्माण्ड में हैं मिल्की वे

इस अपने आकाशगंगा में ही अनेकों सूर्य
कई गुने बड़े अपने सविता से
इनकी गिनती ही इतनी बड़ी है
असंभव है बांधना कविता से

प्रत्येक सविताओं की तो हैं
सूर्यमंडल अपनी अपनी
ब्रह्माण्ड में असंख्य सूर्यमंडल
वर्णन नहीं कर सकती कोई कथनी

अपने सूर्य के नौ गृह हैं
बुद्ध, शुक्र, पृथ्वी , अरुण
मंगल आदि कई गुने बड़े ग्रह
बृहस्पति शनि और वरुण

ब्रह्माण्ड तो है विभु, आकाशगंगा में
पृथ्वी का है क्या आकार !
यदि आकाश गंगा पृथ्वी जैसी वृहद्
तो क्या पृथ्वी सरसों (mustard seed ) इतना भी बड़ा !

ब्रह्माण्ड में अनेकों जीव समृद्ध ग्रह नक्षत्र
ब्रह्मलोक नहीं है मिथ्या
क्या पुष्ट नहीं करतीं इस तथ्य को
धरती पर दिखतीं कुछ उड़न तश्तरियां



सम्बंधित ग्रहों का अनुदान स्रोत सूर्य
भरता जीवित ग्रहों में प्राण
अगणित प्रकार की फ्रीक्वेंसीज का
है यह अपना सविता भण्डार

मानव का हैसियत बस एक व्यष्टि
पर उसमें है विद्यमान जो है समष्टि में
जो गुण मनुष्य के अन्दर, दैवीय स्थान
वे विद्यमान हैं इस सृष्टि में

मानव की हैसीयत कितनी बड़ी
उसे मात्र कुछ की ही जरूरत
शतांश नहीं कोटि अंश ही धारण कर पाती
और लौटा देती है कुदरत

सूक्ष्मभाव मनोसंस्थान की
बड़ी सम्बन्ध दैवीय शक्तियों से
उचित भाव ट्यूनिंग को मोडें
जैसे गलत ट्यूनिंग पर नहीं रेडियो से

असंगत लग सकती हमें
क्योंकि हम हैं माया प्रकृति के अधीन
हम सीमितता छोड़ आगे बढ़ें
जैसे जल चीरती है मीन

मनुज जितना सकता है सोच
जितने सारे गुण अभिलाषा
समझ सकता मिल परब्रह्म
सर्वशक्तिमान उसकी परिभाषा

दोहा - सविता प्राण का भण्डार, जीवन का आधार |
गायत्री मंत्र जप से, आती उससे धार || 12

नवरात्रियाँ विज्ञान सिद्ध हैं
ज्योतिष ग्रहों के स्थिति पर निर्भर
किस कोण पर कौन ग्रह कैसी तरंग
जिससे प्रभावित होती सचराचर

ऐसी दिव्य फ्रीक्वेंसीज आतीं नवरात्रि में
जो भरी पड़ीं हैं दैवीय शक्ति
साधना भाव में सहायक होतीं
जैसे तूफ़ान की रूख अनुकूल किश्ती

भव सागर तरने की रफ्तार
जाती है कई गुनी बढ़ी
अनुकूल फ्रीक्वेंसी उचित भण्डारण
बीती मात्र कुछ ही घडी !!

जिस जीव में जो भी अल्प
चाहे वो भौतिक या अध्यात्मिक
सविता तो देव समान है समृद्ध
देना तो एक गुण है दैविक

आध्यात्मिक यन्त्र भी हैं इन
ऐनर्जिज के पकड़ने की उचित विधान
मिस्र के पिरामिड भी हैं
इसी विधि के कुछ उचित प्रमाण


किस आकार और डायमेंशन में होगी कितनी
दैवीय ऐनर्जिज के निवास
मात्र कौतुहूल ही नहीं मगर ये
सुनिश्चित तरंगे महाकाश !

वैज्ञानिक यंत्रों के निर्माण में
लम्बाई और चौडाई का महत्व
अध्यात्म क्षेत्र भी विशाल
इसके यंत्रों में भी वह तत्त्व

\"वायब्ग्योर\" की सात रंग का
भी सम्बन्ध वेब्लेंथों से
अंगूठी पहनें या वस्त्र पहने, आती धारें
उचित आकाशीय पिंडों से

कोई राजा कोई रंक कोई हँसता कोई रोता
अद्भूत है यह जगत प्रपंच
मात्र तीन घंटे का अभिनय यह
जब तक विद्यमान यह मंच

दोहा - माया जकड़ी दुनिया, अद्भूत है संसार |
वास्तविकता है क्या, करतें रहें विचार || 13

( Written by Sri Prakash [ sriprakash.rai@gmail.com ] for Gayatri Shaktipeeth, Harbanshpur Azamgarh ,)

Om Bhurbhuvaha Swaha tatsaviturvarenyam bhargo devasya dhimahi dhiyo yo nh prachodayat

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