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January 08 2014 9:05pm IST


   झुनझुना ( By Sri Prakash ) ; January 08 2014 9:05pm IST

 

झुनझुना


अबोध है शिशु, झुनझुनों में खोया रहा
एक को तोड़ दी, दूजा पा फूलता रहा

देख आकर्षक खिलौना, बच्चे ने रोना मचाया
ऐसा ही खरीद कर दूँगा, माता पिता ने समझाया
देख उसकी यह नादानी, हम सब क्यों हँसते
तू भी तो बचकानी आदतें अपनाता रहा

बच्चा तो नादान है, उम्र ही ख़ास है
व्यस्क होने पर ही, विवेकशीलता का आस है
पर क्या कहें उस व्यक्ति को जो इस तरह,
व्यस्क होने पर भी भूलभुलैया भटकाता रहा

एक प्राप्ति कर दूजे को, पाने की इच्छा उठी
इच्छा मन पर कब दस्तक दे, यह मर्यादा टूटी
विवेक ताक पर रखा, क्या उचित क्या अनुचित
वासना अहम् की कसौटी पर इच्छा को कसवाता रहा

तुच्छ को उचित दिखातीं, क्षुद्र हैं कसौटियां,
सुख प्राप्ति को मन खोजे , नई नई तरकीबियाँ
नकारती उस राह को, जो सुख का अक्षय खजाना दिलाये
कोयला बटोरकर क्यों, हीरे को झुठलाता रहा

उम्र के ही साथ बदले, झुनझुनों के विविध रूप
बचकानी मनोवृति स्थिर, न बदली क्षद्म स्वरुप
उमर के साथ समझदारी भी बढती रहे
पुरानी राह चल क्यों, दूजों को भी उकसाता रहा

झुनझुनों को पाने में, लगा दी पूरी जोश
प्राप्त कर खेल लिया, फिर भी छाई असंतोष
स्थायी रहती तो पुरानी क्यों नीरस लगती ?
बस यही न सोचा और शाश्वत को भुलाता रहा

हमेशा बढती रहे वो, स्थायी कौन सी चीज ?
पास रहते हुए भी, जो है नही नसीब,
उसे पाने की कोशिश क्यों न ? साध करके मन को
शाश्वत को छोड़ता रहा, नश्वर को बटोरता रहा

दाने दाने को प्राणी तड़पें, यदि पड़े अकाल
कुछ लोगों के लिए बनता, जीवन मृत्यु का सवाल
कठिनता से प्राप्त जल, जो किसी के जीवन का रक्षक है
छीन कर निष्ठुरता से निज चरण धोता रहा

संग्रह प्रवृति के वशीभूत हो, निर्बलों का शोषण
ऊपर से दिखावा दान की, करता अहम् का पोषण
पैसा त्याग न, अज्ञान- त्याग ही है असली त्याग
हजारों बटोर, कुछ लुटाने का दंभ भरता रहा

घटिया आदर्श सोच, पहुँच दिखाने की कोशिश
दांव-पेंच पाने को, पूरे शक्ति से साजिश
पूरा जीवन दांव पर लगाया, दौड़ा नश्वर के पीछे
क्षणभंगुर सफलता के निज, राग अलापता रहा

तथाकथित बड़ों को भूलकर, पीढियां पूजे महानता
त्याग व सत्य की न करें, कोटि झुनझुने समानता
महानता पाना है तो, अज्ञान त्याग करके ही मिले
झुनझुनों से तो कदापि नहीं, फिर मन मसोसता रहा

जगत को गुरु बना ली, नश्वर प्राप्ति को विकल
अज्ञान दृष्टि जागृत हुआ, लोभ मोह हुआ प्रबल
शोषण दहन की आग उठी, निर्बल हकों की आहुतियाँ
इर्ष्या में खुद भी जलता, दूसरों को जलाता रहा

ज्ञान की ही जरूरत है, यह पाटे कृत्रिम खाई
अज्ञान- बस खोदता ही रहा, कैसे हो भरपाई ?
लिप्सा इतनी बढ़ी की, दूसरे का हक भी भेंट चढ़े
मन से इतना गरीब हुआ, दूजों को विलखाता रहा

आत्म-पथ राजमार्ग है, अनुभूति शाश्वत की अनूठी
आकर्षक द्वार, अँधेरा गलियारा, मन की यह राह झूठी
सवारी करनी है तो, आत्मा से करने की सोच
मनचला बन कर क्यों , निज को ही ठगता रहा ?


(Written by Sri Prakash [ sriprakash.rai@gmail.com ], 2004)

Om Bhurbhuvaha Swaha tatsaviturvarenyam bhargo devasya dhimahi dhiyo yo nh prachodayat

Comments

pypeStity wrote...
why not

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