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January 08 2014 9:05pm IST


    वास्तविक सफलता - आध्यात्मिक भौतिकता ( By Sri Prakash ) ; January 08 2014 9:05pm IST

 

वास्तविक सफलता - आध्यात्मिक भौतिकता

1. सफलता का पैमाना ना, सांसारिक उपलब्धि.
साधन शुद्धता वो सतत, टकराती परिस्थिति..

2. परजीवी उगते नहीं, निज के बलबूते.
पेड़ों पर अमरबेल व, नमी में कुकुरमुत्ते..

3. अनुकूल परिस्थितियों में, बढती कैसे जीवट ?.
एक असफलता का अवसर, कर देत सब चौपट..

4. मिट्टी की इमारत खड़ी, बालू की है नींव.
एक तूफानी झोंका, चित्रित करे सजीव..

5. स्वार्थ अहम् युक्त चले, ज्यों भेड़ों का धसान.
बनी बनाई राह पर, क्यों इतना अभिमान?..

6. भावनाएं मर गयीं, दृष्टि रही संकीर्ण.
दायें बाएं ना देखा, राह कंटकाकीर्ण..

7. उपलब्धियों में करत, वासना अहम् की नृत्य.
असफलता में चाहे वो, आत्महत्या जैसी कृत्य..

8. सच पूछो तो हो गया, भीतर से खोखला.
कमजोर नस पकड़ा जाय, तो गया बौखला..

9. निकाल निकाल थक चुके, वो बाल का खाल.
सब तरीके बंद तो, बस घिसी पिटी चाल..

10. बुद्धि का उपयोग किया, आत्मा अविकसित.
एकांगी विकास की, भावना निर्वासित..

11. भाव संवेदना नष्ट, बना पैशाचिक नर.
अहम् की सींग लगी, वासना-पूंछ जानवर..

12. क्या टिके क्या नश्वर, क्या मान अपमान.
भूत तरीके लग पड़ा, पागल की पहचान..

13. कुबेर बन चढ़े तथाकथित, उन्नति की सीढ़ी.
इक्का दुक्का अपवाद, न पाई चौथी पीढी..

14. पात्रता विकसित नहीं, हटी नहीं कुसंस्कार.
मुफ्त माल खपत हुए, दारू जुआ व्यभिचार..

15. निज का नहीं हो सका, दूजे का क्यों होय ?.
पागल स्मृति नाश में, निज पहचान ज्यों खोय ..

16. लक्ष्य असली जीवन का, नहीं तो है भोग.
बच्चों को क्या मिले?, निज राह संयोग !..

17. सच पूछो तो लक्ष्य ना, निज राह पर ना भरोस.
तभी तो सब भूल करे, प्रताडित हो निर्दोष..

18. \"ओवरटेक\" ही लक्ष्य बना, ख़त्म कब सिलसिला?.
जैसे पागल शेर को, अब सवा शेर मिला..

19. सब मर्यादा तोड़ दी, क्या नीति अनीति?.
निर्दोष कुचले गए, फिर भी कमी प्रतीति..

20. अध्यात्म भूल गई, यह पहिया अवरूद्ध.
चिंतन चरित्र तुच्छ हुई, गिरी गाड़ी गई टूट.

21. दुर्घटना में फंसकर, पड़े काल की गाल.
या \"ओवरटेक\" कर देखे, सवा शेर तत्काल..

22. एक पाने के चक्कर में, दूजे को क्यों खोय?.
भौतिक पहिये पर नहीं, इतनी भरोसा होय..

23. जीवन गाड़ी सुधरती, अध्यात्म पहिया लगाय.
जीवन लक्ष्य की ओर, सरपट दौड़ा जाय..

24. जीवन गाड़ी संतुलित, सुविधा नहीं हथकडी.
गति से आगे बढती, पहिये बंधी न पटरी..

25. राह में दुर्घटना की, संभावना शून्य.
अध्यात्मवादी भौतिकता, नहीं तरीका अन्य..

26. अध्यात्म साथ लेकर, जीवन में करे सैर.
गति भी बनी रहे, दूजों की भी खैर..

27. मेरे नहीं तेरे वास्ते, कर्म बना निष्काम.
उपलब्धियां क्यों बांधें?, मुश्किल गए तमाम..

28. परिस्थितियाँ टकराकर, देतीं बड़ी मनोबल.
कमजोरियां हो जातीं, दुम दबाकर ओझल..

29. प्रयत्न व पुरुषार्थ हैं, सफलता के मापन.
हार कर भी जीत जाए, अपनाकर सत्य साधन.

30. देवदारु पहाड़ पर, खजूर रेगिस्तान.
क्यों कि जड़ें भीतर, जीवट की पहचान..

31. असली जीत यही है, नहीं बनना शैतान.
बुद्धि निर्दोष बना ले, मनुजता की पहचान..

32. अपनापन बढ़ता चले, सबके हित में हित.
स्वस्थ वातावरण विकसित, सहयोगी संस्कृति..

33. टेक्नीक सामाजिक व, विविध प्रकार क्रान्ति.
अध्यात्म सबका पूरक, विरोध बस है भ्रान्ति.. .

(Written by Sri Prakash [ sriprakash.rai@gmail.com ], 2004)

Om Bhurbhuvaha Swaha tatsaviturvarenyam bhargo devasya dhimahi dhiyo yo nh prachodayat

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