Apane Ang Awayavon se  || Satsankalp  ||  Chat    Login   
  Home | About | Web Swadhyay | Forum | Parijans | Matrimonials
Gayatri Pariwar- Parijans & Matrimonials
 Welcome  Register Matrimonial / Parijan      Search Matrimonial / Parijan      Search Blogs     Search Links     Search Poetries     Search Articles      Image Gallery

Latest Posted Poetries
Latest Posted Articles
Short Stories
Poetries By Sri Prakash
1 to 31 of 31 |      
भोगवादी विज्ञान - अध्यात्म संवाद (2 comments)
प्राकृतिक सौंदर्य में प्रज्ञावतार दर्शन (1 comments)
क्यों न हम आगे आयें  (1 comments)
भोगवादी समाज बनाम आध्यात्मिक समाज (0 comments)
प्रज्ञावतरण (0 comments)
फिर बाकी कौन तमन्ना ? (1 comments)
मनुष्य और भगवान् (1 comments)
नव-ज्योति (0 comments)
प्रकृति से सीख (0 comments)
साधना समर (0 comments)
साधना (0 comments)
नरपशु और नरपिशाच (0 comments)
कल्याणकारी और आदरणीय व्यक्तित्व (0 comments)
माया, धन और चंचल मन (0 comments)
व्यक्तित्व (0 comments)
वास्तविक सफलता - आध्यात्मिक भौतिकता (0 comments)
बिना अध्यात्म के प्रोफ़ेशनलिजम (0 comments)
वासना (0 comments)
छद्म महानता (0 comments)
सत्य की उपज (0 comments)
सत्य की उपज (0 comments)
सांसारिक (1 comments)
शांतिकुंज (0 comments)
झुनझुना (1 comments)
दिव्य आतंरिक-लोकों की यात्रा व उनमें निवास (0 comments)
तुम्हें कोटि प्रणाम (0 comments)
युवा चेतना (6 comments)
विज्ञान - सुख सरोवर , सुखसागर है अध्यात्म- Part 1 (0 comments)
विज्ञान - सुख सरोवर , सुखसागर है अध्यात्म- Part 2 (0 comments)
श्रीगुरु श्रीराम शर्मा आचार्य चालीसा ( स्वांत सुखाय ) (18 comments)
तपोभूमि का त्रिदिवसीय प्रवास (0 comments)
January 08 2014 9:05pm IST


   प्रज्ञावतरण ( By Sri Prakash ) ; January 08 2014 9:05pm IST

 


प्रज्ञावतरण

क्या नहीं होता क्षुब्ध देख प्रकृति पुत्रों को -
कुपोषण, कुसंस्कार, अशिक्षा - अन्धकार में देखकर रे मन !
क्या नहीं दे सकते हम उनको आश्वासन
कैसे प्राप्त कर सकते मोक्ष, लगा ध्यान, बस बैठ अपने आसन ?
वर दो कि जब तक शरीर रहे हे भगवन
उठाएं उनको उस स्थिति से निज प्राण पण
नहीं चाहता मनोविनोद या किसी दर्शन का रसास्वादन
क्योंकि हमारे गुरु में ही हैं कबीर, चैतन्य
दादू, मीरा, सहजो, बल्लभ, रामानुज महामन
शंकर, विट्टल, रामदास, रामकृष्ण व विवेकानंद
वेद, संहिता, ब्रह्मण, आरण्यक , आगम निगम या पुराण
नहीं चाहता अवेस्ता, लाओत्से , त्रिपिटक, बाइबल या कुरान
सब तारें हैं शशिरूप है. निज गुरु के ज्ञान



(Written by Sri Prakash [ sriprakash.rai@gmail.com ] for Gayatri Shaktipeeth , Harbanshpur, Azamgarh, )

Om Bhurbhuvaha Swaha tatsaviturvarenyam bhargo devasya dhimahi dhiyo yo nh prachodayat

Comments

Send Comment

 Name                 
 Email                 
 Comment                  
                


  awgp.org  |  dsvv.org  |  diya.net.in  |  RishiChintan.org  |  awgpypmp.org   |  lalmashal.com
To send Query / Comments / Suggestions click Here  
Best viewed in Firefox