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Poetries By Sri Prakash
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January 08 2014 9:05pm IST


   क्यों न हम आगे आयें ( By Sri Prakash ) ; January 08 2014 9:05pm IST

 

क्यों न हम आगे आयें


विचार मथे , प्रतिभा मुड़े, घटायें हटी , आशा दिखी
इक्कीसवीं सदी के नव प्रभात में, स्वर्णिम प्रकाश भर जाए
सदभाओं की चिडियां चहकें, दुर्भावों की रजनी दूर हो
निशा के अन्तिम प्रहर, में ही आँखें खुल जाएं
क्यों न हम आगे आयें......


ऋषिओं की तप -शक्ति अपार, अभिपूरित हो गुरुवर विचार
बह पड़ी शांतिकुंज की ओर , ले सम्मिश्रण की अद्भुत सुवास
असुरता की लू चल रही है जग में,
शांतिकुंज से मलय पवन यह , सारे जग में बह जाए
क्यों न हम आगे आयें......

कुटिलता, कुवचन, कुदृष्टि, कुविचार , कुरीतियां फैली हैं जग में
शोषण , हत्या और आतंकवाद, बड़ी समस्या है मग में
हो मद-मस्त हम उस मलय पवन से-
स्नेह , सज्जनता और सद्-भावों में होड़ लगाएं
क्यों न हम आगे आयें......

मानव मानव के बीच जो कटुता कपट की ज्वाला है
उसका परिवर्तन अब, प्रेम सरलता में होने वाला है
ले चलें युग-शिल्पिओं लाल मशाल , करें दूर यह विनाश विकराल
गुरुवर के कारण सत्ता को, निज कर्मों से हरषाएं
क्यों न हम आगे आयें......

मानस सागर के उत्ताल तरंगों को, करे नियोजित विचार क्रांति में
तूर्त - फुर्त, अधैर्य चंचलता, का परिवर्तन हो मनः शान्ति में
त्याग तपस्या प्रज्ञा- शक्ति, विवेक सौहार्द उच्च गुरु भक्ति
सादा जीवन-उच्च विचार, साधना को अपनाएं
क्यों न हम आगे आयें......

गुरुवर के साहित्य से , अपना मन है मथा हुआ
लोग भले ही उपहास करें, तो भी क्या हुआ ?
आध्यात्मिकता नहीं वो जो, नहीं सह सकती असत्य व्यंग्य
अनास्था के दुर्भिक्ष काल में, सत्सागर के मोती चुन लायें
क्यों न हम आगे आयें.....


विश्वमाता बहुत दुखी है, देख अपने संततियों का दुःख
आशा भरी निगाहों से, देख रही है प्रज्ञा पुत्र
गुरु लुटा रहे दिव्य अनुदान
नही चाहिए सिद्धि, मोक्ष, स्वर्ग, कीर्ति, लाभ और झूठी शान
बस वर दो हे ऋषि-युग्म , हम आपके ही हो जायें
क्यों न हम आगे आयें......

महाकाल गुहार लगाता, मांग रहा पुरुषार्थ प्रचंड
भागो मत वीरों तुम रुको, माँ के लज्जा का है प्रश्न
संस्कृति नग्न हो रही , चिल्लाती सीता
कहाँ गए तुम आर्य पुत्र और लक्ष्मण !
शपथ खाई थी हमनें माटी की, क्षात्रत्व तो दिखला जायें
क्यों न हम आगे आयें......

बड़े त्याग से मिली स्वाधीनता
हमें फिर जकड़े हुए है, सुक्ष्म अधीनता
बोल-चाल, व्यवहार , कला और प्रचलन
खान -पान ,नृत्य , संगीत और रहन सहन
सभी अधीन हैं क्या दीखतें नही यह सब ?
गुरुवर आपकी कृपा से दिव्य दृष्टि ही खुल जाए
क्यों न हम आगे आयें......

सरकार चलाती रहे योजना, चलते रहे भेडिओं के षड्यंत्र
सिंह शावकों के बिना कभी, क्या हटी है परतंत्र ?
अर्थ तंत्र सब तंत्रों पर हावी, कर रहा है मनमानी
धर्म तंत्र व राजतन्त्र बिका , पैसा पैसा ही सबकी वाणी
हे गुरु वर दो हम, ब्राह्मणत्व को जगा पायें
क्यों न हम आगे आयें......

किसका राजतन्त्र में रह गया भरोसा ?
क्या ऐसा ही था जनक, का गणतंत्र ?
रक्षक को भक्षक होते कैसे देख सकते हम ?
हो धर्मतंत्र से राजतंत्र, नही राजतंत्र से धर्मतंत्र
हे गुरु ऐसा करो की राम राज्य उतर आए
क्यों न हम आगे आयें......

कहाँ उतना प्रकृति सौन्दर्य, नदी, झील, झरने, सरोवर
कम होती जा रही सुषमा प्रकृति में, ऐसे बढ़ रही प्रदुषण
धड़धड़राती राक्षसी मशीनें , ध्वनि, जल, वायु, खाद्यान्न दूषण
सुक्ष्म प्रकृति कैसी विषन्न !, विचारों की विभीषिका भीषण
हे गुरु वर दो हम, हरीतिमा संवर्धन में लग जाएं
क्यों न हम आगे आयें......

आधी जनसंख्या को देख उपेक्षित क्या, होता नही मन में विषाद ?
समर्पण की साक्षात् प्रतिमा पर, छायी हुयी आज अवसाद
श्रद्धा की प्रतीक मात्रि शक्ति पर, अश्लीलता की पड़ी पाश
नही देखना अब दहेज़ में, जलते नव-बधुओं की लाश
हे गुरु वर दो कि , नारी जागरण अभियान सफल हो जाए
क्यों न हम आगे आयें......

कौन है अपना कौन पराया, चला जायेगा कल जो आया
सब अपने हैं , कोई नही पराया, जगत बस मन की प्रतिच्छाया
एक ब्रह्म है, एक सृष्टि है, सबका लक्ष्य वह परमानन्द है
मोह पिंजरा, बंद है पंक्षी, बन्धन कटे तो हो उन्मुक्त, हवा में सैर लगाये
क्यों न हम आगे आयें......

हे वेदमूर्ति, हे तपोनिष्ठ, हे महाप्राज्ञ , हे युग विश्वामित्र !
हे महाकाल आप सुक्ष्मिकृत हैं व्याप्त, हमारे मन के अभीष्ठ
नही माँगते शक्ति, दे दो भक्ति
हो जीव विराट मिलन का ब्रह्मानंद, हम आपके ही हो जायें
क्यों न हम आगे आयें......
(Written by Sri Prakash [ sriprakash.rai@gmail.com ] for Gayatri Shaktipeeth , Harbanshpur, Azamgarh, )

Om Bhurbhuvaha Swaha tatsaviturvarenyam bhargo devasya dhimahi dhiyo yo nh prachodayat

Comments

Ravi Kumar wrote...
True.. we must come forward.. The time has come..

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