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January 08 2014 9:05pm IST


   प्राकृतिक सौंदर्य में प्रज्ञावतार दर्शन ( By Sri Prakash ) ; January 08 2014 9:05pm IST

 

विचारों के तीव्र संघात से युक्त , गया गंगा तट पर बड़े सवेरे
कुविचार छंटा, ज्ञानोदय हुआ, तमसाच्छादित ह्रदय में मेरे

गंगा का किनारा था, मद-मस्त ऋतुराज का महीना था
एक अद्भुत सुगंध भासता जो, स्वच्छ पवन में भीना था

हल्की ओसों की बूंदें झरतीं थीं, सरसों के पुष्पों पर
दीखते मणि के तरह जब पड़तीं, स्वर्णिम रश्मियां उनपर
फुले सरसों के खेतों के बीच, घुमावदार पगडण्डीयां
जैसे सुलझा रही हों कुछ, पुरानी पहेलियाँ

गंगा की शीतल जल, शांत योगी के तरह
न कोई चंचलता, न कोई भी लहर
लगता कि वे जा रहे निसंग
तभी ऐसी शान्ति, स्वच्छता , सरलता, उमंग

तभी आई सविता क्षितिज पर, पड़ा प्रकाश समानांतर सिर पर
पड़ी एक रश्मि सरसों पुष्प पर, और चमकी त्रिशूल महाकाल -मन्दिर पर


मन-मोर डोल उठ , अध्यात्मिक भावनाएं उठ्नें लगे
एक संत गंगा-स्नान से निवृति हो, आश्रम जाने लगे

स्वच्छ साफ वातावरण होने लगा, अन्धकार हटने लगा
सौ सौ स्वर्ग इस सुषमा पर समर्पित होने लगा

फिर संतों का एक समूह दिखाई पड़ा,
जैसे शंकाओं को नष्ट करने, सद्-भावों का सेना चला
सात्विकता के आकर्षण से, मन फिर ऐसे खिन्चा ,
कि व्यष्टि मन , समष्टि मन से जा कर मिला

तभी एक आकर्षक आवाज़ , जैसे अन्धकार असुरता को भगा आज
शंख-शहनाई से कर रही, घोषणा आज एक-छत्र राज

ऐसी ही घटना आज समाज, अन्धकार-असुरता हो रही नष्ट आज
विचार क्रांति -पवन का तीव्र संघात, इक्कीसवीं सदी वह नव-प्रभात

भासती हमें प्रज्ञावतार , क्रमशः छंट रहा असुरता-अन्धकार
गुरु विचारों की लहर, जलाती जा रही सामाजिक जहर


(Written by Sri Prakash [ sriprakash.rai@gmail.com ] for Gayatri Shaktipeeth , Harbanshpur, Azamgarh, )

Om Bhurbhuvaha Swaha tatsaviturvarenyam bhargo devasya dhimahi dhiyo yo nh prachodayat

Comments

Ravi Kumar wrote...
nice...

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