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Poetries By Sri Prakash
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तपोभूमि का त्रिदिवसीय प्रवास (0 comments)
January 08 2014 9:05pm IST


   भोगवादी विज्ञान - अध्यात्म संवाद ( By Sri Prakash ) ; January 08 2014 9:05pm IST

 

विज्ञान पूर्वाग्रही कहता कि, अध्यात्म है अफीम की गोली
मैं गुरुवर का शिष्य अड़ गया, सुनकर उसकी यह बोली
मैंने कहा कि चलो तो अपनी, सूक्ष्मता दर्शाओ
जहाँ जहाँ तक है तेरी पहुँच, उसको तुम बताओ

बोला कि मेरी पहुँच इलेक्ट्रान , प्रोटान तक है
और मेसान आदि तीसो एंटी कणों तक है
किसको किसको मैं बतलाऊँ, ये गिरगिट के तरह रंग बद्लतें हैं
चलते हैं बड़े ही नियमित, एंटी कणों से नही मिलते हैं
यदि ये चल पड़ें अनियमित, तो सृष्टि का प्रलय हो जाए
परमाणु बम की क्या विसात, हैड्रोजन बम भी फीका पड़ जाए

मैं फिर उससे पूछा कि क्या, जड़ ही सृष्टि की ईकाई है ?
यदि जड़ ही है मौलिक तो क्यों, प्रकृति में राग समाई है
क्यों फूल हर लेता मन को, उसमें है पावन सुगंध
क्यों भावनाएं प्रभाव कर देती, मोहित करती मलय गंध
क्यों दलितों को देखकर ह्रदय पिघलता , टिकी हुई यह वसुन्ध
क्यों अध्यात्म में शाश्वत आनंद, भौतिक सुख हो जाती मंद
हे बन्धु तुझे मैं नही चिढाता, न ही मजाक का है मन
हे मेरे पूरक ! आओ, मुझसे मिलो तब समझोगे असली दर्शन

ऐसा है कि मौलिकता जड़ में नहीं, चेतन सत्ता में ही है
कण कण में व्याप्त परमात्म सत्ता, ही सबका अनुशासक है
यह घटना है ब्रह्माण्ड के घट घट में समाया,
जग-नियंता ही चेतन शक्ति है, क्या समझ में आया ?
ऐसा है कि बुद्धि अपूर्ण , और अपूर्ण वैज्ञानिक यन्त्र
अध्यात्म के लिए साधना आवश्यक, मानव शरीर सुव्यवस्थित तंत्र
ले लो सहायता अखंड ज्योति की, जप लो कुछ गायत्री मंत्र
इसमें भावना स्वतंत्र चाहिए, नही चाहिए मन परतंत्र
मोह तोड़ो , वासना दबाओ, संयम करो और करो ध्यान
आसन , प्राणायाम , प्रत्याहार , करो अस्वाद आदि तप विधान
स्वाध्याय , सत्संग करो, और सतगुरु के सम्पर्क में जाओ
ऐसा न हो सके तो सीधे , शांतिकुंज का टिकट कटाओ !

बहुत सुना , शेष कल समझाना, पी लूँ एक सिगरेट
घर पे नही पी सकता, मम्मी डैड लेगें देख
जाना तो चाहता था फ़िल्म, मम्मी डैड से कह आये
उन्हें भी साथ जाना था, पर वे थे पहले ही देख आये
डैड बोले बेटा ! लेते आना एक सिगार
चोर गिरहकट फैले हुये हैं, इसका तुम रखना विचार
मम्मी बोली मेरा बेटा, नही किसी से कम होशियार
ये भी तो है आपका, सबसे बड़ा पाकेटमार !
और कुछ नही बताना चाहता भाई, लग रही है लाज
देर हो गई \'मूड डिस्टर्ब\' है, चला फिर से अपने समाज

उसके चले जाने पर लगा सोचने, प्रकृति की यह अद्भुत माया
एक नही लगभग हर किसी के, मन-मुर्ख को भरमाया
प्रकृति की वो परा शक्ति, ले उचित समय पर उचित युक्ति
दिलाती सबको उचित ढंग की, घटना से मन भ्रम मुक्ति
इस विचार से अपने , मन मष्तिष्क को ठंडा पाया,
एक दिन वह कल्पना मित्र , मेरे मन में आया

नेत्र झर झर बरस रहे थे, कारुणिक थी वह रूदन !
नही होता था चुप , बोला, देने पर बार बार आश्वासन

मम्मी डैड में मतभेद हो गया, मामला चला गया अदालतों में
मैं तो पिस गया उनके, तर्कों कुतर्कों के बीच के पाटो में
छोटी बहन चिल्ला रही है, समझ पडोसिओं को अनजाना !
सुबह से हम लोग भूखे हैं , नही आता मुझे खिचडी पकाना

लगता था ऐसे जैसे कई , परिस्थितियों का मारा प्राणी
दांत निकले दैन्य दिखाता , रो रहा हो वो मनमानी

यही दशा बन रही समाज की, कहानी बन सकती यह घर घर की
आध्यात्मिकता यदि आज नही, तो कल यह स्थिति जरूर आएगी
पारिवारिक सदस्यों के बीच दरारें पड़ेगी, कामुकता की वातावरण छायेगी
हे देवसंस्कृति के सपूतों, क्या यही थी अपनी संस्कृति ?
हम क्यों अपनाते पाश्चात्य संस्कृति को, क्यों ओढ़ते हैं अपकीर्ति ?
असुरता का मद मर्दन करो, जकड रही यह आज समाज
क्या ऋषिओं के रक्त नही संचरण , करते अपने नसों में आज ?


यदि आतंरिक अभिलाषा हो, किंतु नही मनोबल विश्वास
माँ गायत्री के शरण में जाएं , करें गुरु अनुदान की आस

(Written by Sri Prakash [ sriprakash.rai@gmail.com ] for Gayatri Shaktipeeth , Harbanshpur, Azamgarh, )

Om Bhurbhuvaha Swaha tatsaviturvarenyam bhargo devasya dhimahi dhiyo yo nh prachodayat

Comments

Ravi Kumar wrote...
thought in the poem is very nice... Yes, science and spirituality have to be combined and infact, these are getting closer these days..Now, consciousness is being considered in science experiments.. http://plato.stanford.edu/entries/qt-consciousness/

rdrgsh@gmail.com wrote...
Nice Poetry.. much inspirable....

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