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Gayatri Pariwar- Parijans & Matrimonials
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स्वस्थ रहने के स्वर्णिम सूत्र  (0 comments) 
October 07 2015 3:44pm IST
स्वस्थ रहने के स्वर्णिम सूत्र (0 comments) 
October 07 2015 3:38pm IST
FOR MARRIAGE (0 comments) 
September 20 2015 1:54pm IST
Yoga Retreat (0 comments) 
September 05 2015 1:15pm IST
अंतराष्ट्रीय योग दिवस २१ जून २०१५ - लेखिका पुनिता साह झारखंडी, गुजराती !! (0 comments) 
June 28 2015 2:48pm IST
वैलेंटाइन डे की कहानी (0 comments) 
February 12 2015 8:39am IST
गायत्री शक्तिपीठ में तर्पण, पिण्डदान, श्राद्ध संस्कार में प्रतिदिन सैकड़ो महिलाए-पुरूष ले रहे भाग (1 comments) 
September 13 2014 5:57pm IST
dinesh sahu gayatri pariwar multai (0 comments) 
September 12 2014 4:28pm IST
ब्रह्म सत्य जगन्माया-अलबर्ट आइन्स्टीन की दृष्टि में (0 comments) 
June 22 2014 11:13pm IST
क्रोध क्या हैं ?  (0 comments) 
June 07 2014 4:46pm IST
મહાશિવરાત્રી :- આ વ્રત, ભગવાન શિવને સમર્પિત છે !! (0 comments) 
February 27 2014 1:03pm IST
પ્રેમ....!! (0 comments) 
February 08 2014 8:44pm IST
માતૃત્વ-ઇશ્વ્રરના કાર્યમાં ભાગીદારી !! (0 comments) 
February 06 2014 6:38pm IST
वसंत - जीवन मधुमय होगा, रूठी हुई प्रकृति हँस पड़ेगी व पूर्ण होगी  (0 comments) 
February 04 2014 8:49am IST
સ્ત્રી-પ્રેમ અને લગ્ન !! (0 comments) 
February 03 2014 3:16pm IST
માતૃપ્રેમ !! (0 comments) 
February 03 2014 3:01pm IST
સુંદરતા અને ખૂબસૂરતી,સ્ત્રી અને પુરુષની !! (0 comments) 
January 31 2014 4:30pm IST
स्वाध्याय सत्संग शिविर मथुरा- एक काव्यात्मक अनुभूति  (0 comments) 
January 08 2014 8:40pm IST
हिंदू विवाह संस्कार !! (0 comments) 
January 02 2014 1:48pm IST
धर्म क्या और अधर्म क्या है ?  (0 comments) 
January 02 2014 1:30pm IST
तांडव नृत्य व क्वांटम सिद्धांत !! (0 comments) 
January 02 2014 1:12pm IST
महिलाओ के हित में उठते हमारे कदम !! (0 comments) 
January 02 2014 1:08pm IST
ऐसे आते हैं भगवान आपसे मिलने बस पहचानने की देर है !! (0 comments) 
January 02 2014 1:06pm IST
संकल्प शक्ति WILL POWER !! (0 comments) 
January 02 2014 1:06pm IST
जय श्रीराम –ॐ जय श्रीराम !! (0 comments) 
January 02 2014 1:05pm IST
चरण स्‍पर्श !! (0 comments) 
January 02 2014 1:03pm IST
शिवत्व के बिना सुंदरता मूल्यहीन !! (0 comments) 
January 02 2014 1:02pm IST
संस्कार धरोहर अपनो की !! (0 comments) 
January 02 2014 1:02pm IST
कैलाश पर्वत !! (0 comments) 
January 02 2014 1:01pm IST
तिलक का मह्त्व !! (0 comments) 
January 02 2014 12:59pm IST
जय श्रीराम – ॐ जय श्रीराम !! (0 comments) 
January 02 2014 12:57pm IST
श्रीकृष्ण भगवान ने गीताजी में कई अभय वचन दिए हैं । ये सभी वचन, किसी राजकीय पक्ष द्वारा दिए गए खोखले वचन नहीं है, लेकिन विश्वनियंता की ओर से दिए गए नक्कर वचन है !! (0 comments) 
January 02 2014 12:55pm IST
GP Latest Audios (0 comments) 
October 20 2014 9:33pm IST
जग दीवाना कृष्ण का और कृष्ण दीवाने राधा के !!  (0 comments) 
August 26 2013 10:29pm IST
राधा-कृष्ण विवाह !! (0 comments) 
August 26 2013 10:28pm IST
श्री कृष्ण नाम का अर्थ !! (0 comments) 
August 26 2013 10:27pm IST
श्री श्री राधा नाम का अर्थ !! (0 comments) 
August 26 2013 10:26pm IST
राधा श्री राधा रटूं, निसि- निसि आठों याम। जा उर श्री राधा बसै, सोइ हमारो धाम !! (0 comments) 
August 26 2013 10:26pm IST
अद्भूत है ‘बैद्यनाथ’, जहां त्रिशूल नहीं ‘पंचशूल’ है !! (0 comments) 
August 26 2013 10:24pm IST
भगवान भूतनाथ नाम का अर्थ !! (0 comments) 
August 26 2013 10:23pm IST
श्री बाबा धाम यात्रा !! (0 comments) 
August 26 2013 10:22pm IST
इस मंदिर में लगती है ‘भोलेनाथ’ की अदालत !! (0 comments) 
August 26 2013 10:21pm IST
सदाचरण से आत्म-विश्वास की प्राप्ति (Self-Confidence Achieved Through Conduct) (0 comments) 
August 08 2013 10:43am IST
आत्म-संतोष की उपलब्धि (Achievement of Self-satisfaction) (0 comments) 
August 08 2013 10:42am IST
पर दोष दर्शन की कुत्सा त्यागिए (0 comments) 
August 01 2013 11:20am IST
कठिनाइयों का भी स्वागत करें (0 comments) 
August 01 2013 11:18am IST
चरित्र और धन (Character and Wealth) (0 comments) 
July 23 2013 10:11am IST
चरित्र एक सर्वोपरि संपदा (Character: A Paramount Asset) (0 comments) 
July 19 2013 10:04am IST
अभिभावकों का उत्तरदायित्व (Parents’ Responsibilities) (0 comments) 
July 19 2013 10:04am IST
चरित्र की एक विशेष देन : अभय (Unique Reward of Moral Character: Fearlessness) (0 comments) 
July 19 2013 10:03am IST


   श्रीकृष्ण भगवान ने गीताजी में कई अभय वचन दिए हैं । ये सभी वचन, किसी राजकीय पक्ष द्वारा दिए गए खोखले वचन नहीं है, लेकिन विश्वनियंता की ओर से दिए गए नक्कर वचन है !! Posted By pushpak (January 02 2014 12:55pm IST)

 

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जीवन की हर एक हलचल के केन्द्र में आज नारी की महत्वपूर्ण स्थिति है। अब उसके वजूद को दर-किनार नहीं किया जा सकता है। निश्चित ही नारी लेखन का दायरा अब भी सीमित है लेकिन समर्थ लेखिका पुनिता साह ने शानदार कलम चलाई है। श्रीकृष्ण भगवान ने गीताजी में कई अभय वचन दिए हैं । ये सभी वचन, किसी राजकीय पक्ष द्वारा दिए गए खोखले वचन नहीं है, लेकिन विश्वनियंता की ओर से दिए गए नक्कर वचन है !!
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"हे पार्थ ! शुभ कर्म करने वाले किसी मनुष्य का इस लोक में या परलोक में विनाश नहीं होता । हे तात ! शुभ कर्म करने वाले किसी की भी, कभी भी दुर्गति नहीं होती । योगभ्रष्ट मानवी, सत्कर्म करनेवालों के लोक को पाकर, कई साल वहां रहेने के बाद, पवित्र मनुष्यों के कुल में, श्रीमंत मनुष्यों के घर, या तो बुध्धिमान योगओं के कुल में जन्म पाता है । जगत में ऐसा जन्म अति दुर्लभ है । माने कि हर किसीको ऐसा जन्म नसीब नहीं होता । वहां जन्म के पश्चात्, उसने पूर्व जन्म में की हुई साधना के संस्कार फिर जागृत होते हैं । जहां से साधना अपूर्ण रह गई थी, वहां से आगे बढकर वह, पूर्ण सिध्धि के लिए, फिर से प्रयत्न शुरु करता है । पूर्वजन्म के अभ्यास की वजह से, उसका मन योग की ओर आकर्षित होता है और कई जन्मों की साधना के बाद, अंत में परम गति प्राप्त करता है । ऐसा योगी, -- तपस्वी, ज्ञानी या अग्निहोत्रादि कर्म करनेवाले से श्रेष्ठ माना जाता है । इसीलिए "हे अर्जुन ! तू योगी बन ।"

हे सखे, सब शक्ति तो तुम्हीं में हैं। हे भगवान्, ये तीनों लोक तुम्हारे पैरों के नीचे हैं। जड़ की कोई शक्ति नहीं प्रबल शक्ति आत्मा की है। हे विद्वान! डरो मत तुम्हारा नाश नहीं है, संसार-सागर से पार उतरने का उपाय है। जिस पथ के अवलम्बन से यती लोग संसार.सागर के पार उतरे है, वही श्रेष्ठ पथ तेरे पास है ।

बड़े-बड़े दिग्गज बह जाएँगे। छोटे-मोटे की तो बात ही क्या है! तुम लोग कमर कसकर कार्य में जुट जाओ, हुंकार मात्र से हम दुनिया को पलट देंगे। अभी तो केवल मात्र प्रारम्भ ही है। किसी के साथ विवाद न कर हिल-मिलकर अग्रसर हो, यह दुनिया भयानक है, किसी पर विश्वास नहीं है। डरने का कोई कारण नहीं है, माँ मेरे साथ हैं, इस बार ऐसे कार्य होंगे कि तुम चकित हो जाओगे। भय किस बात का? किसका भय? वज्र जैसा हृदय बनाकर कार्य में जुट जाओ।
तुमने बहुत बहादुरी की है। शाबाश! हिचकने वाले पीछे रह जाएँगे और तुम कूद कर सबके आगे पहुँच जाओगे। जो अपने उद्धार में लगे हुए है, वे न तो अपना उद्धार ही कर सकेंगे और न दूसरों का। ऐसा शोरगुल मचाओ कि उसकी आवाज दुनिया के कोने-कोने में फैल जाए। कुछ लोग ऐसे है, जोकि दूसरों की त्रुटियों को देखने के लिए तैयार बैठे है, किन्तु कार्य करने के समय उनका पता नहीं चलता है। जुट जाओ, अपनी शक्ति के अनुसार आगे बढ़ो। डर किस बात का है? नहीं है, नहीं है, कहने से साँप का विष भी नहीं रहता है। नहीं नहीं कहने से तो 'नहीं' हो जाना पड़ेगा। खूब शाबाश! छान डालो सारी दुनिया को छान डालो! अफसोस इस बात का है कि यदि मुझ जैसे दो - चार व्यक्ति भी तुम्हारे साथी होते तमाम संसार हिल उठता। क्या करूँ धीरे-धीरे अग्रसर होना पड़ रहा है। तूफान मचा दो तूफान!

किसी बात से तुम उत्साहहीन न हो जब तक ईश्वर की कृपा हमारे ऊपर है, कौन इस पृथ्वी पर हमारी उपेक्षा कर सकता है ? यदि तुम अपनी अन्तिम साँस भी ले रहे हो तो भी न डरना।
सिंह की शूरता और पुष्प की कोमलता के साथ काम करते रहो।
लोग तुम्हारी स्तुति करें या निन्दाए लक्ष्मी तुम्हारे ऊपर कृपालु हो या न हो, तुम्हारा देहान्त आज हो या एक युग में तुम न्यायपथ से कभी भ्रष्ट न हो।
श्रेयांसि बहुवि? नि अच्छे कर्मों में कितने ही वि? आते हैं। प्रलय मचाना ही होगा, इससे कम में किसी तरह नहीं चल सकता। कुछ परवाह नहीं।
दु‍निया भर में प्रलय मच जाएगाए वाह! गुरु की फतह! अरे भाई श्रेयांसि बहुवि? निए उन्ही वि? की रेल पेल में आदमी तैयार होता है। मिशनरी फिशनरी का काम थोडे ही है जो यह धक्का सम्हाले! बड़े-बड़े बह गएए अब गडरिये का काम है जो थाह ले? यह सब नहीं चलने का भैया, कोई चिन्ता न करना।
सभी कामों में एक दल शत्रुता ठानता है; अपना काम करते जाओ किसी की बात का जवाब देने से क्या काम? सत्यमेव जयते नानृतंए सत्येनैव पन्था विततो देवयानः (सत्य की ही विजय होती है, मिथ्या की नहींय सत्य के ही बल से देवयानमार्ग की गति मिलती है।) धीरे-धीरे सब होगा। वीरता से आगे बढ़ो। एक दिन या एक साल में सिध्दि की आशा न रखो। उच्चतम आदर्श पर दृढ़ रहो। स्थिर रहो। स्वार्थपरता और ईर्ष्या से बचो।
आज्ञा-पालन करो। सत्य, मनुष्य .. जाति और अपने देश के पक्ष पर सदा के लिए अटल रहो, और तुम संसार को हिला दोगे। याद रखो .. व्यक्ति और उसका जीवन ही शक्ति का स्रोत है, इसके सिवाय अन्य कुछ भी नहीं।
इस तरह का दिन क्या कभी होगा कि परोपकार के लिए जान जाएगी? दुनिया बच्चों का खिलवाड़ नहीं है। बड़े आदमी वो हैं जो अपने हृदय-रुधिर से दूसरों का रास्ता तैयार करते हैं, यही सदा से होता आया है। एक आदमी अपना शरीर.पात करके सेतु निर्माण करता है, और हजारों आदमी उसके ऊपर से नदी पार करते हैं। एवमस्तु एवमस्तु, शिवोहम् शिवोहम् (ऐसा ही हो, ऐसा ही हो- मैं ही शिव हूँए मैं ही शिव हूँ।) मैं चाहता हूँ कि मेरे सब बच्चे, मैं जितना उन्नत बन सकता थाए उससे सौगुना उन्न्त बनें। तुम लोगों में से प्रत्येक को महान शक्तिशाली बनना होगा- मैं कहता हूँ, अवश्य बनना होगा।

आज्ञा, पालन, ध्येय के प्रति अनुराग तथा ध्येय को कार्यरूप में परिणत करने के लिए सदा प्रस्तुत रहना .. इन तीनों के रहने पर कोई भी तुम्हें अपने मार्ग से विचलित नहीं कर सकता।
मन और मुँह को एक करके भावों को जीवन में कार्यान्वित करना होगा। इसी को श्री रामकृष्ण कहा करते थे,

"भाव के घर में किसी प्रकार की चोरी न होने पाए।" सब विषयों में व्यवहारिक बनना होगा। लोगों या समाज की बातों पर ध्यान न देकर वे एकाग्र मन से अपना कार्य करते रहेंगे क्या तुने नहीं सुना, कबीरदास के दोहे में है- "हाथी चले बाजार में, कुत्ता भोंके हजार साधुन को दुर्भाव नहिं, जो निन्दे संसार" ऐसे ही चलना है। दुनिया के लोगों की बातों पर ध्यान नहीं देना होगा। उनकी भली बुरी बातों को सुनने से जीवन भर कोई किसी प्रकार का महत् कार्य नहीं कर सकता।

अन्त में प्रेम की ही विजय होती है। हैरान होने से काम नहीं चलेगा- ठहरो- धैर्य धारण करने पर सफलता अवश्यम्भावी है- तुमसे कहता हूँ देखना- कोई बाहरी अनुष्ठानपध्दति आवश्यक न हो- बहुत्व में एकत्व सार्वजनिन भाव में किसी तरह की बाधा न हो। यदि आवश्यक हो तो "सार्वजनीनता" के भाव की रक्षा के लिए सब कुछ छोडना होगा। मैं मरूँ चाहे बचूँ, देश जाऊँ या न जाऊँ, तुम लोग अच्छी तरह याद रखना किए सार्वजनीनता-
हम लोग केवल इसी भाव का प्रचार नहीं करते किए "दुसरों के धर्म का द्वेष न करना" नहीं, हम सब लोग सब धर्मों को सत्य समझते हैं और उन्का ग्रहण भी पूर्ण रूप से करते हैं हम इसका प्रचार भी करते हैं और इसे कार्य में परिणत कर दिखाते हैं सावधान रहना, दूसरे के अत्यन्त छोटे अधिकार में भी हस्तक्षेप न करना - इसी भँवर में बडे.बडे जहाज डूब जाते हैं पुरी भक्ति, परन्तु कट्टरता छोडकरए दिखानी होगी, याद रखना उनकी कृपा से सब ठीक हो जाएगा। जिस तरह हो, इसके लिए हमें चाहे जितना कष्ट उठाना पड़े- चाहे कितना ही त्याग करना पडे यह भाव (भयानक ईर्ष्या) हमारे भीतर न घुसने पाए - हम दस ही क्यों न हों- दो क्यों न रहें- परवाह नहीं परन्तु जितने हों सम्पूर्ण शुद्धचरित्र हों।

नीतिपरायण तथा साहसी बनो, अन्तरूकरण पूर्णतया शुद्ध रहना चाहिए। पूर्ण नीतिपरायण तथा साहसी बनो। प्रणों के लिए भी कभी न डरो। कायर लोग ही पापाचरण करते है, वीर पुरूष कभी भी पापानुष्ठान नहीं करते यहाँ तक कि कभी वे मन में भी पाप का विचार नहीं लाते। प्राणीमात्र से प्रेम करने का प्रयास करो। बच्चोए तुम्हारे लिए नीतिपरायणता तथा साहस को छोड़कर और कोई दूसरा धर्म नहीं। इसके सिवाय और कोई धार्मिक मत-मतान्तर तुम्हारे लिए नहीं है। कायरता, पाप, असदाचरण तथा दुर्बलता तुममें एकदम नहीं रहनी चाहिए, बाकी आवश्यक वस्तुएँ अपने आप आकर उपस्थित होंगी।
शक्तिमान, उठो तथा सामर्थ्यशाली बनो। कर्म, निरन्तर कर्मय संघर्ष, निरन्तर संघर्ष! अलमिति। पवित्र और निःस्वार्थी बनने की कोशिश करो .. सारा धर्म इसी में है।
क्या संस्कृत पढ़ रहे हो? कितनी प्रगति हुई है? आशा है कि प्रथम भाग तो अवश्य ही समाप्त कर चुके होंगे। विशेष परिश्रम के साथ संस्कृत सीखो।
शत्रु को पराजित करने के लिए ढाल तथा तलवार की आवश्यकता होती है। इसलिए अँगरेजी और संस्कृत का अध्ययन मन लगाकर करो।
उठोए जागो और तब तक नहीं रुको जब तक लक्ष्य ना प्राप्त हो जाये।
उठो मेरे शेरो, इस भ्रम को मिटा दो कि तुम निर्बल हो, तुम एक अमर आत्मा हो, स्वच्छंद जीव हो, धन्य हो, सनातन हो, तुम तत्व नहीं हो, ना ही शरीर हो, तत्व तुम्हारा सेवक है तुम तत्व के सेवक नहीं हो।
ब्रह्मांड की सारी शक्तियां पहले से हमारी हैं। वो हम हैं जो अपनी आंखों पर हाथ रख लेते हैं और फिर रोते हैं कि कितना अंधकार है!

जिस तरह से विभिन्न स्त्रोतों से उत्पन्न धाराएं अपना जल समुद्र में मिला देती है, उसी प्रकार मनुष्य द्वारा चुना हर मार्ग, चाहे अच्छा हो या बुरा भगवान तक जाता है।
किसी की निंदा ना करें। अगर आप मदद के लिए हाथ बढ़ा सकते है, तो जरूर बढ़ाएं। अगर नहीं बढ़ा सकते, तो अपने हाथ जोड़िएए अपने भाइयों को आशीर्वाद दीजिए, और उन्हें उनके मार्ग पर जाने दीजिए।
कभी मत सोचिए कि आत्मा के लिए कुछ असंभव है। ऐसा सोचना सबसे बड़ा विधर्म है। अगर कोई पाप है, तो वो यही हैय ये कहना कि तुम निर्बल हो या अन्य निर्बल हैं।
अगर धन दूसरों की भलाई करने में मदद करे, तो इसका कुछ मूल्य है, अन्यथा, ये सिर्फ बुराई का एक ढेर है, और इससे जितना जल्दी छुटकारा मिल जाये उतना बेहतर है।

एक शब्द में, यह आदर्श है कि तुम परमात्मा हो।
उस व्यक्ति ने अमरत्व प्राप्त कर लिया है,जो किसी सांसारिक वस्तु से व्याकुल नहीं होता।
हम वो हैं जो हमें हमारी सोच ने बनाया है,इसलिए इस बात का ध्यान रखें कि आप क्या सोचते हैं। शब्द गौण हैं। विचार रहते है,वे दूर तक यात्रा करते हैं।

जब तक आप खुद पर विश्वास नहीं करते तब तक आप भगवान पर विश्वास नहीं कर सकते।

सत्य को हजार तरीकों से बताया जा सकता है, फिर भी हर एक सत्य ही होगा।

विश्व एक व्यायामशाला है,जहां हम खुद को मजबूत बनाने के लिए आते हैं।

इस दुनिया में सभी भेद.भाव किसी स्तर के है,न कि प्रकार के, क्योंकि एकता ही सभी चीजों का रहस्य है।

हम जितना ज्यादा बाहर जायें और दूसरों का भला करें, हमारा ह्रदय उतना ही शुद्ध होगाए और परमात्मा उसमे बसेंगे।

Punita sah

Written By / Source :Punita sah

Om Bhurbhuvaha Swaha tatsaviturvarenyam bhargo devasya dhimahi dhiyo yo nh prachodayat

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