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Gayatri Pariwar- Parijans & Matrimonials
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सदवाक्य      

    ज्ञान को मस्तिष्क रुपी खरल में जितना घोंटा जाता है, साधना, स्वाध्याय-सत्संग द्वारा जितना प्रखर बनाया जाता है , उतना ही वह सूक्ष्मतम बनते हुए मस्तिष्क कोष्ठों में समाहित होता जाता व मनुष्य को प्रज्ञावान बनाता है । यही ज्ञान की पूँजी जन्म-जन्मान्तरों के लिए फिक्स्ड  ड़ीपोजीट  का काम करती है ।
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(1)सार्थक और प्रभावी उपदेश वह है, जो वाणी से नहीँ, अपने आचरण से प्रस्तुत किया जाता है॥

(2)मंजिल मिल ही जायेगी, भटकते हुए ही सही।
गुमराह तो वो हैँ, जो घर से निकले ही नहीँ॥

(3)अनजान होना उतनी लज्जा की बात नहीँ, जितनी सीखने के लिए तैयार न होना॥

(4)एक समझदार व्यक्ति तब बोलता है, जब दूसरे अपने शब्दोँ का इस्तेमाल कर चुके होते हैँ॥

(5)निष्कृष्ट चिँतन एवं घृणित कर्तव्य हमारी गरिमा पर लगा हुआ कलंक है॥

(6)जीवन का अर्थ ही क्या रह जायेगा यदि हम मेँ सतत्‌ प्रयत्न करने का साहस न रहे॥

(7)अपना मूल्य समझो और विश्वास करो कि तुम संसार के सबसे महत्वपूर्ण व्यक्ति हो॥

(8)स्वधर्म के प्रति प्रेम, परधर्म के प्रति आदर और अधर्म के प्रति उपेक्षा करनी चाहिए॥

(9)कभी-कभी उन लोँगोँ से भी शिक्षा मिलती है जिन्हेँ हम अभिमानवश अज्ञानी समझते हैँ॥

(10)बड़ी सोच, बड़े सपने और बड़ा लक्ष्य सफलता की पहली सीढ़ी है॥

(11)अपना सुधार संसार की सबसे बड़ी सेवा है॥

(12)अच्छे समाज की कल्पना करना अच्छी बात है, उससे अच्छी बात यह है कि अच्छे समाज के निर्माण मेँ दो कदम चलना॥

(13)दुनिया ऐसे लोगोँ से अटी पड़ी है जो असाधारण सुख की आस मेँ संतोष को ताक पर रख देते हैँ॥

(14)वहीँ मनुष्य ईश्वर के दर्शन कर सकता है, जिसका अन्तःकरण निर्मल और पवित्र है॥

(15)स्वास्थ्य की हानि होने पर न तो प्रेम, न ही सम्मान, न ही धन-दौलत और न ही बल द्वारा हृदय को खुशी मिल सकती है॥



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